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Chandragupta Maurya Raja Kaise Bane

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चंद्रगुप्त मौर्य कौन है?

विशाल मौर्य वंश के संस्थापक और मौर्य वंश का उदय करने वाले चंद्रगुप्त मौर्य एक बहुत ही विशाल साम्राज्य के सम्राट थे। और मौर्य वंश के विकास से लेकर के इसकी उदय होने तक की पूरा श्रेय सिर्फ चंद्रगुप्त मौर्य को ही जाता है। चंद्रगुप्त मौर्य भारत के प्राचीन समय में मौर्य वंश के संस्थापक कहा जाता था। चंद्रगुप्त मौर्य का साम्राज्य ना केवल इन्हीं देशों में अपितु दक्षिण भारत के पठारी इलाकों तक फैला हुआ था। चंद्रगुप्त मौर्य अपने गुरु चाणक्य जी के साथ नंद साम्राज्य को समाप्त करने की घोषणा कर चुके थे। उन्होंने नंद वंश के साम्राज्य को समाप्त कर दिया और मौर्य वंश की स्थापना कर दी। 

और यह अब भी इसी नाम से जाना जाता हैं। चंद्रगुप्त मौर्य अपनी नीति के कारण न सिर्फ भारत पर ही नहीं बल्कि आसपास के कई देशों पर भी राज किया था। चंद्रगुप्त मौर्य ने लगभग 23 वर्षों के सफल शासन करने के बाद सभी प्रकार के सांसारिक सुख आदि मोह मायाओं को त्याग दिया और इसके पश्चात वे खुद को एक जैन साधु में बदल दिए।लोगों के द्वारा ऐसा कहा जाता है कि उन्होंने सल्लेखना किया 

< अशोक को महान क्यों कहा जाता है

सल्लेखना हर किसी के बस की बात नहीं है। सल्लेखना एक ऐसी तपस्या है, जिसमें किसी भी व्यक्ति को अपने तक एक ऐसा व्रत रखना होता है कि वह कुछ नहीं खाएगा और भूखे ही रहकर के जीवन भगवान की पूजा अर्चना करना होगा।चंद्रगुप्त मौर्य ने देश के कई छोटे खंडित प्रदेश को एक साथ मिलाया और इन्होंने एक बहुत ही बड़े साम्राज्य का निर्माण किया। इनका यह साम्राज्य बहुत ही बड़ा था।

चंद्रगुप्त मौर्य के शासनकाल के दौरान मौर्य साम्राज्य पूर्व बंगाल और असम से पश्चिम में अफगानिस्तान और बलूचिस्तान से लेकर उत्तर भारत के कश्मीर और नेपाल तक फैला हुआ था,

चंद्रगुप्त मौर्य का जन्म कब हुआ?

चंद्रगुप्त मौर्य का जन्म ईसा महीने के जन्म से तक़रीबन 340 वर्ष पूर्व हो चुका था।इनकी माता का नाम मुरा था। वही उनके पिता का नाम सर्वार्थसिद्धि था। बिंदुसार इनके उत्तराधिकारी थे। उनका जन्म किसी तिथि को पाटलिपुत्र में हुआ था। 

चंद्रगुप्त मौर्य जी की शिक्षा

चंद्रगुप्त मौर्य अपनी शिक्षा को हस्तगत करने लायक नहीं थे, जिसके कारण यह अपना पूरा दिन इधर उधर केवल खेलने और अपने परिवार की देखरेख में ही बिता देते थे।और इसके बाद उन्होंने तुरंत ही इनके पिता के उपस्थित इन्हें खरीदने का प्रस्ताव रखा। 

इनके पिता के स्थिति इतनी दयनीय थी कि इन्होंने चंद्रगुप्त को महा पंडित चाणक्य को गोद दे दिया। इसके बाद महापंडित चाणक्य ने चंद्रगुप्त मौर्य को शास्त्र और विज्ञान का ज्ञान प्राप्त करवाया, जिसके कारण चंद्रगुप्त मौर्य इस संपूर्ण देश के अच्छे जानकार बन गए और जिन्होंने संपूर्ण देश पर राज भी किया

एक बार जब महा पंडित चाणक्य जी इस गांव के भ्रमण से निकल रहे थे, तब उन्होंने चंद्रगुप्त को देखा और यह चंद्रगुप्त को देखते ही उनकी शक्तियों को पहचान गए।

चंद्रगुप्त मौर्य का प्रारंभिक जीवन

यदि हम कई प्रकार के शासकों इत्यादि के हादसों को देखें तो हमें यह पता चला है की चाणक्य जी नंद वंश के विनाश के लिए बहुत ही शक्तिशाली और बुद्धिमान होने के साथ-साथ एक चालाक व्यक्ति की खोज कर रहे थे।  जिसके दौरान यह मगध राज्य का चारों तरफ़ घूम रहे थे

तभी उन्होंने देखा कि चंद्रगुप्त मौर्य एक दोस्त के साथ खेल रहे थे। तभी वहां पर महान पंडित चाणक्य जी आए चंद्रगुप्त मौर्य का प्रारंभिक जीवन और उन्होंने चंद्रगुप्त मौर्य को देखा। उन्होंने नंद राजा के साम्राज्य को समाप्त करने के लिए चंद्रगुप्त मौर्य को अपनी संयुक्त प्रॉपर्टी टैक्स को एक विशाल सेना में बदलने का हिदायत दिया, उसके पश्चात उन्होंने उनकी संपूर्ण संपत्ति को एक बहुत ही विशाल सेना में बदल दिया।

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लोगों के द्वारा ऐसा कहा जाता है कि पंडित चाणक्य ने चंद्रगुप्त मौर्य के खेल में उनकी मार्ग दर्शन को देखा और उसके बाद वे चंद्रगुप्त के मार्ग दर्शन कौशल से इतने प्रभावित हो गए। चाणक्य जी ने उन्हें ट्रेंड करने का विचार बना लिया। इसके बाद वे चंद्रगुप्त को विभिन्न सतह पर शिक्षा प्रदान करने से पहले चंद्रगुप्त को अपना पुत्र बनाना चाहा। और इसके लिए उन्होंने चंद्रगुप्त को उनके पिता से खरीद लिया और उसके बाद चाणक्य जी ने चंद्रगुप्त को तक्षशिला लेकर चले गए।

चंद्र गुप्त मौर्य की भूमिका रूप व्यवस्था क्या थी

मौर्य वंश के साम्राज्य में अपने इंजीनियरिंग हैरत जैसे जलाशय, सड़क, सिंचाई, मंदिर और विभिन्न प्रकार के खानों के लिए जाना जाता है। इन सड़कों का विस्तार इन्होंने इतनी अच्छी तरीके से करवाया जैसे कि इन सड़कों से बड़े वाहन जैसे बैलगाड़ी इत्यादि बड़ी ही आसानी से गुजर सकते थे। चंद्रगुप्त मौर्य जी ने अपनी भूमिका रूप व्यवस्था में एक राजमार्ग भी बनवाया जो कि इस समय में पाटलिपुत्र के तक्षशिला को जोड़ता है। ऐसा इसलिए कहा जाता है क्योंकि चंद्रगुप्त मौर्य जलमार्ग के बहुत बड़े हिमायती नहीं थे, Chandragupta Maurya Raja Kaise Bane  इसीलिए उनका , मुख्य पथ सड़क पथ ही था। उन्होंने अपनी और अपने राज्य की सरलता के लिए कई प्रकार की सड़के बनवाई।

चंद्रगुप्त मौर्य जी के द्वारा निर्मित अन्य राजमार्गों के द्वारा अनेक प्रकार की राजधानी जैसे नेपाल, देहरादून, उड़ीसा, आंध्रप्रदेश, कर्नाटक इत्यादि जैसे स्थानों को जोड़ती थी।

नंद वंश का अंत कैसे हुआ था?

महापंडित चाणक्य जी को नंद वंश के शासक ने बहुत ही तिरस्कृत किया था, जिसके कारण चाणक्य जी नंद वंश के शासक से बहुत ही नफ़रत करते थे, इसके लिए उन्होंने यह प्रण कर लिया कि वह नंद वंश का दुर्दशा कर देंगे। अंततः चंद्रगुप्त के आ जाने के पश्चात चाणक्य जी को नंद वंश का दुर्दशा करने का एक बहुत ही अच्छा अवसर प्राप्त हुआ।

Chandragupta Maurya Raja Kaise Bane

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चंद्रगुप्त मौर्य ने चाणक्य की परामर्श प्राप्त करने के बाद प्राचीन भारत के हिमालय क्षेत्र के शासक राजा पर्वत के साथ गठबंधन कर लिया। Chandragupta Maurya Raja Kaise Bane  चंद्रगुप्त मौर्य जी ने पर्वत का संयुक्त सेना के साथ नंद वंश साम्राज्य पर वर्ष 322 ईसा पूर्व में आक्रमण कर दिया और इन्होंने नंद वंश का भीतरी कर दिया।

नंद वंश के अंत के पश्चात मौर्य वंश का विस्तार

चंद्रगुप्त मौर्य ने नंद वंश के ध्वंस के पश्चात भारतीय उपमहाद्वीप के उत्तर पश्चिम मैसेडोनियन सूबेदार को हराया। इसके बाद चंद्रगुप्त मौर्य ने सेल्यूकस के खिलाफ युद्ध का ऐलान कर दिया जो एक यूनानी शासक था। सेल्यूकस वहीं था, जिसका नियंत्रण भारत के अधिकतर क्षेत्रों पर था। में बतादूँ की सेल्यूकस ने अपनी बेटी का चंद्रगुप्त मौर्य से शादी करने के लिए बात रखी था।

इसके बाद गठबंधन के बाद इस राज्य में प्रवेश किया था। सेल्यूकस की सहायता से चंद्रगुप्त मौर्य ने कई क्षेत्रों को प्राप्त कर लिया और इसके बाद चंद्रगुप्त मौर्य ने दक्षिण एशिया तक अपने साम्राज्य को विस्तार कर दिया। Chandragupta Maurya Raja Kaise Bane चंद्रगुप्त मौर्य भाग विस्तार के कारण चंद्रगुप्त मौर्य के साम्राज्य को पूरे एशिया तक में जाना जाने लगा।

सेल्यूकस को पहले सिकंदर ने पकड़ा था, सिकंदर से तो सभी लोग परिचित होंगे क्योंकि इस के संदर्भ में एक बहुत ही मशहूर लोकोक्ति है यह लोकोक्ति है “जो जीता वही सिकंदर

मौर्य वंश का उदय कैसे हुआ?

मौर्य वंश के उदय के बारे में तो कई तथ्य हमारे सामने निकल कर के आते हैं। मौर्य वंश के बारे में ज्यादा जानकारी आपको ग्रीक, जैन धर्मों के साथ-साथ बौद्ध धर्म और हिंदू प्राचीन ब्राह्मणवाद के गानों में भी आपको चंद्रगुप्त मौर्य के विषय में जानकारी प्राप्त हो जाएगी।कुछ लोगों का ऐसा मानना है कि चंद्रगुप्त मौर्य एक नंद राजकुमार थे और उनकी नौकरानी मुरा का एक नाजायज बच्चा था। Chandragupta Maurya Raja Kaise Bane लोगों का मानना है कि चंद्र गुप्ता मौर्य जाति से संबंधित है जो कि पीपलीवाला के एक प्राचीन गणराज्य के एक क्षत्रिय कबीले के थे जो रोमिंग दे और कसया के मध्य रहा करते थे। कि चंद्रगुप्त मौर्य से पहले भी यह वंश रहा करता था परंतु यह वंश अधिक प्रचलन में नहीं था। इसे ऊपर लाने का श्रेय सिर्फ और केवल चंद्रगुप्त मौर्य को ही जाता है। 

हमें अन्य विचारों से यह पता चलता है कि चंद्रगुप्त मौर्य या तो मुरार वंश से या फिर इंडो-एशियन वंश से संबंधित है जो कि एक क्षत्रिय हुआ करते थे। सभी साथियों से यह स्पष्ट हो जाता है ।

चंद्रगुप्त मौर्य की मृत्यु

चंद्रगुप्त मौर्य को बिंदुसार ने सिंहासन पर बैठाया था। बिंदुसार की पत्नी ने एक पुत्र को जन्म दिया जो कि अशोक के नाम से जाने जाते हैं। अशोक जी भारतीय उपमहाद्वीप के सबसे शक्तिशाली राजाओं में से एक थे।Chandragupta Maurya Raja Kaise Bane चंद्रगुप्त मौर्य जी द्वारा बनाया गया यह साम्राज्य संपूर्ण विश्व में सबसे बड़ा बन गया था।

यह साम्राज्य इन्होंने ऐसा बना दिया था कि इसकी तुलना करने वाला भिन्न कोई भी साम्राज्य नहीं था। चंद्रगुप्त मौर्य के द्वारा बनाया गया यह साम्राज्य करीब 130 वर्षों तक आने वाली उत्पत्ति के लिए बढ़ा हुआ था। Chandragupta Maurya Raja Kaise Bane आपको बता दे कि चंद्रगुप्त मौर्य की मृत्यु 297 ईसा पूर्व के आसपास आध्यात्मिक संत गुरु भद्रबाहु के मार्गदर्शन में हुई थी।

चन्द्रगुप्त मौर्य का साम्राज्य?

चंद्रगुप्त मौर्य के शासनकाल के दौरान मौर्य साम्राज्य पूर्व बंगाल और असम से पश्चिम में अफगानिस्तान और बलूचिस्तान से लेकर उत्तर भारत के कश्मीर और नेपाल तक फैला हुआ था, चंद्रगुप्त मौर्य अपनी कुशल नीति के कारण न केवल भारत पर ही नहीं बल्कि आसपास के अनेक देशों पर भी राज किया था। Chandragupta Maurya Raja Kaise Baneचंद्रगुप्त मौर्य का साम्राज्य ना केवल इन्हीं देशों में अपितु दक्षिण भारत के पठारी इलाकों तक फैला हुआ था।

चन्द्रगुप्त का मूल्यांकन

चन्द्रगुप्त की गिनती भारत के महान सम्राटों में की जाती है। और उसने महान शान्ति एवं सुरक्षा स्थापित की। वह प्रजा के कल्याण का निरन्तर ध्यान रखता था और उनकी सहायता के लिए उद्यत रहता था।वास्तव में वह एक प्रजा पालक सम्राट था। राधाकुमुद मुकर्जी ने उसकी गणना भारत के महानतम शासकों में की है।उसने भारत से विदेशी शासन का अन्तिम करके भारत को गुलामी की जंजीरों से स्वतंत्र किया। उसने अपने अधिकारों का भी अनुचित उपयोग नहीं किया। 

चन्द्रगुप्त मौर्य को भारत का प्रथम ऐतिहासिक सम्राट् क्यों कहा जाता है

Chandragupta Maurya Raja Kaise Bane चन्द्रगुप्त मौर्य का मूल्यांकन चन्द्रगुप्त मौर्य को भारतीय इतिहास का प्रथम ऐतिहासिक और सफल सम्राट कहा जाये तो अनुचित न होगा,क्योंकि उसी समय से भारत की राजनीतिक घटनायें तिथियुक्त तथा क्रमबद्ध रूप में मिलती हैं। Chandragupta Maurya Raja Kaise Bane चन्द्रगुप्त मौर्य सही अर्थों में पहला ऐतिहासिक व्यक्ति था, जिसे भारत का सम्राट् कहा जाता है। डॉ० वी० ए०स्थिम ने लिखा है

चन्द्रगुप्त मौर्य की ऐतिहासिक महत्ता निम्न तथ्यों से प्रकट होती है

विशाल साम्राज्य निर्माता

चन्द्रगुप्त मौर्य का साम्राज्य बड़ा विशाल था। इसके भीतरी अफगानिस्तान, बलूचिस्तान के विशाल प्रदेश, कलिंग, सौराष्ट्र, मालवा तथा दक्षिणी भारत के मैसूर तक का प्रदेश सामूहिक हो गया था। उसे विजेता के साथ-साथ एक महान् साम्राज्य निर्माता कहना न्यायसंगत है। साम्राज्य हिन्दूकुश पर्वत से लेकर बंगाल तक तथा हिमालय पर्वत से लेकर मैसूर कर्नाटक स्थित  था।

एक महान विजेता

  • चन्द्रगुप्त वास्तव में एक महान् विजेता कहा जा सकता है क्योंकि वह एक परिवार में जन्म व्यक्ति था। उसने मात्र अपने पुरुष एवं छात्रवृत्ति के आधार पर चाणक्य से दोस्ती की और मगध जैसे शक्तिशाली राज्य को जीता।
  • उसे कोई छोटा-मोटा राज्य भी उत्तराधिकार के रूप में नहीं मिला था जिसके आधार पर वह कई राज्यों को जीतकर अपना राज्य विस्तारपूर्वक करता। प्लूटार्क का कहना है कि 6लाख सैनिकों की विशाल सेना लेकर चन्द्रगुप्त मौर्य ने पूरा भारत को रौंद डाला।
  • कि वास्तव में चन्द्रगुप्त महान विजेता था। इतिहासकार स्मिथ का तो यहाँ तक कहना है कि “कई बातों में उसकी शासन व्यवस्था की झलक आजकल की संस्थाओं में देखने को मिलती है।

लोक कल्याणकारी शासक

  • वह स्वेच्छाचारी शासक होते हुए भी प्रजा के हित का विशेष ध्यान रखता था। वास्तव में सम्पूर्ण मानव जाति का हितैषी था।
  • इस तरह चन्द्रगुप्त मौर्य सभी तत्वज्ञ के द्वारा भारत का सर्वश्रेष्ठ महान् विजेता और साम्राज्य सम्राट माना जाता है।वह फारस के ‘डेरियस’ की भाँति निरंकुश शासक नहीं था ।

मौर्य काल का इतिहास जानने के प्रमुख साधनों का उल्लेख

Chandragupta Maurya Raja Kaise Bane भारत में सिकन्दर के आक्रमण के समय और उसके बाद कई यूनानी लेखकों ने भारत की उस समय का राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक एवं धार्मिक दशाओं का प्रशंसा किया है।Chandragupta Maurya Raja Kaise Bane विशाखदत्त संस्कृत भाषा के उच्चकोटि के विद्वान थे।यूनानी राजदूत मेगस्थनीज ने चन्द्रगुप्त के दरबार में आकर तत्कालीन भारत की स्थिति का विवरण अपनी ‘इण्डिका’ नामक कृति में किया है।

इस प्रकार यह कृति मौर्यकालीन इतिहास को जानने का प्रमाणिक स्रोत है। चन्द्रगुप्त के मंत्री विष्णुगुप्त चाणक्य ने भी ‘अर्थशास्त्र’ नामक ग्रन्थ की रचना की थी। इस ग्रन्थ में भी मौर्यकालीन इतिहास पर प्रकाश डाला गया है।

चन्द्रगुप्त मौर्य एवं सेल्यूकस के बीच सन्धि क्यों हुई?

Chandragupta Maurya Raja Kaise Bane सिकन्दर की मृत्यु के बाद उसके एशियाई साम्राज्य पर उसके सेनापति सेल्यूकस ने अधिकार पा लिया। Chandragupta Maurya Raja Kaise Bane उसने 305 ई० पू० में भारत पर आक्रमण कर दिया। चन्द्रगुप्त मौर्य ने उसे पराजित किया। सेल्यूकस को एक सन्धि करनी पड़ी।

सन्धि की शर्ते
  • चन्द्रगुप्त ने 500 हाथी सेल्यूकस को पुरोहित दिये।
  • सेल्यूकस ने चन्द्रगुप्त की सभा में मेगस्थनीज नामक एक राजदूत भेजा। इस सन्धि के कारण मगध साम्राज्य की पश्चिमी सीमा हिन्दूकुश पर्वत तक फैल गई।
  • सेल्यूकस ने अपनी पुत्री का विवाह चन्द्रगुप्त मौर्य के साथ कर दिया।
  • सेल्यूकस ने चन्द्रगुप्त को हिरात, कन्धार, काबुल घाटी एवं बलूचिस्तान के चार प्रान्त उपहार में दिये।
चंद्रगुप्त मौर्य की विजयों का वर्णन
मुक्ति का युद्ध

Chandragupta Maurya Raja Kaise Baneचन्द्रगुप्त के लिए यूनानियों के उत्तर-पश्चिम को मुक्त करना आसान काम नहीं था। अलेक्जेंडर के यूनानी सतप्रासन मैसेडोनियन गैरीसन की सहायता  से अपने आवर्जन का प्रयोग कर रहे थे।  जैसा कि यह था, इसकी गर्दन से सेवाभाव का जंजाल और उसके राज्यपालों को मौत के घाट उतार दिया। Chandragupta Maurya Raja Kaise Bane इस मुक्ति का लेखक सैंड्रोकोटस (चंद्रगुप्त) था। मुक्ति का युद्ध सिकंदर की मरण और उसके सेनापतियों के बीच टकराव ने भारत में यूनानियों की स्थिति को कमजोर बना दिया था। चंद्रगुप्त ने स्थिति का पूरा फायदा उठाया। Chandragupta Maurya Raja Kaise Bane  जस्टिन मुक्ति की कहानी का कथन इस प्रकार करता है। “सिकंदर की मरणके बाद भारत हिल गया था, हालाँकि, भारतीय विरोध प्रदर्शन का एक हिस्सा उत्तर-पश्चिम में काम कर रहा था, मुक्ति का युद्ध क्योंकि यह 323 ईसा पूर्व में Greek Sartpas Ninicor और Philpopos की हत्या से सत्यतापूर्ण है।







 

सिंध की विजय

चंद्रगुप्त ने सबसे पहले सिंधियों को मासेदोनियन के जुए से मुक्त किया। सिंध सिकंदर के साम्राज्य का एक हिस्सा था। सिंध की विजय 321 ईसा पूर्व में ताह्रादिसस की विभाजन संधि में, सिंध के यूनानी गवर्नर को उत्तर-पश्चिम में स्थानांतरित किया गया था और चंद्रगुप्त ने लोअर सिंध को अपने ऑपरेशन के आधार के रूप में इस्तेमाल किया और 321 ईसा पूर्व तक पूरे सिंध ने उस पर विजय प्राप्त की और इस तरह के पद खाली पड़े थे।

पंजाब की विजय

पंजाब पर अपना अधिकार स्थापित करने के बाद, चंद्रगुप्त ने पंजाब की ओर देखा। पंजाब की स्थिति चंद्रगुप्त के लिए अनुग्रह थी। उस समय तक तक्षशिला का अभी गुमनामी में गुजर गया। पंजाब की विजय राजा पोरस की हत्या Greek general Eudemus ने की थी जो भारत से भाग गया था।

तब उन्होंने पश्चिम की ओर सिंधु नदी तक March किया और झेलम और सिंधु के बीच की भूमि पर विजय प्राप्त की।”सिंधु प्रागिक मगध की सीमा को पार करता है”। इस प्रकार चंद्रगुप्त ने उत्तरी पश्चिमी भारत, अर्थात सिंध और पूर्वी पंजाब को यूनानियों से सिंधु नदी से मुक्त कराया।

अम्बी की गिरावट, पोरस की हत्या और Eudemus की उड़ान ने चंद्रगुप्त के लिए काम आसान कर दिया। उसने झेलम तक पूर्वी पंजाब को जीत लिया।

नंदों का पराभव

फिर चंद्रगुप्त ने अपना ध्यान नंदों के अतिग्रहण की ओर लगाया। उनका कार्य आसान हो गया क्योंकि अग्रेज या धना नंद अपने विषयों के साथ बहुत जनसामान्य थे। महावामा टीका इस संबंध में एक कहानी सुनाती है कि इस हार के बाद जबकि चंद्रगुप्त ने एक बूढ़ी महिला की झोपड़ी में खुद को छुपा लिया, उसने उस बूढ़ी महिला को अपने बच्चे को डांटते हुए सुना, जिसने बीच से केक खाने के लिए अपनी उंगलियों को जलाया था, न कि एक तरफ से।

चंद्रगुप्त ने नंदा सत्ता को उखाड़ फेंकने के लिए पृथक रणनीतियों को अपनाया। जैन और बौद्ध परंपराओं के अनुसार, चंद्रगुप्त ने सबसे पहले मगध के केंद्र पर हमला करने का दोष लगाया, लेकिन असफल रहा।चंद्रगुप्त ने इसे एक सबक के रूप में लिया और फ्रंटियर के दूसरे हमले की शुरुआत की, अपने पीछे की रक्षा की और फिर पाटलिपुत्र को घेर लिया और धाना नंदा को मार डाला। जैन लेखक हेमाचंद्र के अनुसार, धाना नंदा को नहीं मारा गया था,

लेकिन राजधानी छोड़ने की अनुमति दी गई थी। पंजाब, सिंध और मगध की अपनी विजय के द्वारा, चंद्रगुप्त ने खुद को पूरे हिंद-गंगा के मैदानों और उससे परे, जहां तक कि हिंदुकुश का मालिक बना दिया।

सेल्यूकस निकेटर के साथ युद्ध

सीरिया से अफगानिस्तान तक अपने साम्राज्य को पुनर्गठित करने के बाद, वह 305 ईसा पूर्व में सिकंदर के विजय के भारतीय भागों को फिर से जोड़ने के लिए आगे बढ़ा, एपलियस ने वर्णन किया है Chandragupta Maurya Raja Kaise Bane  कि सेल्यूकस ने सिंधु पार की और एंड्रोकोटस (चंद्रगुप्त) पर युद्ध छेड़ा। चंद्रगुप्त की विजय केवल भारत के प्राकृतिक सीमाओं तक ही सीमित नहीं थी।

उसने भारत की भौगोलिक सीमाओं के बाहर के क्षेत्रों पर विजय प्राप्त की। सेल्यूकस निकेटर, सिकंदर के जनरलों में से एक अपने गुरु की मृत्यु के बाद पश्चिमी एशिया का मास्टर बन गया।  उसने गडरोसिया बलूचिस्तान या कम से कम चंद्रगुप्त को इसका एक हिस्सा भी सौंप दिया। Chandragupta Maurya Raja Kaise Bane  उत्सुकता से पर्याप्त है, शास्त्रीय लेखक चंद्रगुप्त और सेल्यूकस निकेटर के बीच संघर्ष का कोई विवरण नहीं देते हैं। वे बस चंद्रगुप्त और सेल्यूकस के बीच संपन्न हुई संधि की शर्तों का वर्णन करते हैं।

इस युद्ध में सेल्यूकस को बुरी तरह से हराया दिया और काबुल, कंधार और हेरात में अपनी राजधानी के साथ चंद्रगुप्त, परोपनिषदई, अरचोसिया और आरिया को सौंप दिया गया।

पश्चिमी भारत की विजय

चंद्रगुप्त ने पश्चिमी भारत में सौराष्ट्र और काठियावाड़ पर विजय प्राप्त की। यह तथ्य रुद्रदामन के गिरनार रॉक शिलालेख (आधुनिक जूनागढ़) से साबित हुआ है। चंद्रगुप्त ने अवंती के पड़ोसी प्रांत को भी हटा दिया Chandragupta Maurya Raja Kaise Bane और उसकी राजधानी उज्जैन मौर्य वायसराय की सीट बन गई। पश्चिमी और दक्षिणी भारत की विजय से चंद्रगुप्त ने अपने साम्राज्य को और आगे बढ़ाया।

महाराष्ट्र के कोंकण क्षेत्र के सोपारा में असोकन रॉक एडिक्ट की खोज महाराष्ट्र के एक हिस्से की विजय को वर्णित प्रसंग करती है। इस प्रकार पश्चिमी भारत में चंद्रगुप्त ने महाराष्ट्र के सौराष्ट्र, अवंती और कोंकण पर विजय प्राप्त की।

दक्षिण की विजय

दक्षिणी भारत पर विजय प्राप्त करके चंद्रगुप्त ने भारत का राजनीतिक एकीकरण किया। लेकिन दक्षिण में चंद्रगुप्त की विजय की सीमा एक विवादात्मक प्रश्न है क्योंकि डॉ वीए स्मिथ की राय में, चंद्रगुप्त उत्तर में अपने साम्राज्य को मजबूत करने में इतना अस्त–व्यस्त था 

चंद्रगुप्त ने दक्षिण में मौर्य साम्राज्य को मैसूर और नेल्लोर तक बढ़ाया। रॉक एडिट्स II और XIII से यह विदित है कि अशोक के साम्राज्य को मैसूर और दक्षिण में नेल्लोर तक विस्तारित किया गया था। Chandragupta Maurya Raja Kaise Bane  कि उसे दक्षिण की विजय और विजय के लिए समय नहीं मिल सका। दक्षिण का काम उनके बेटे बिन्दुसार का था।

लेकिन डॉ स्मिथ के इस अवबोध को विद्वानों ने इस आधार पर अस्वीकृत कर दिया इतिहास में एक विजेता के रूप में ख्यात नहीं हैं।लेकिन जैसा कि अशोक ने अपने जीवन में केवल एक विजय प्राप्त की, अर्थात कलिंग और बिन्दुसार के पास अपने उत्तम की कोई जीत नहीं थी, यह निश्चय है कि दक्षिण में मौर्य साम्राज्य का विस्तार चंद्रगुप्त का काम था

अशोक के तीन छोटे Rock Edits Mysore के चीतल ड्रग जिलों में पाए गए हैं जो कि श्रवण बेलगोला से बहुत दूर नहीं है। आसोकन एडिट्स की खोज यह साबित करती है कि मैसूर चंद्रगुप्त के साम्राज्य में शामिल था। चंद्रगुप्त ने दक्षिणी भारत के एक हिस्से पर विजय प्राप्त की।

कि वम्बा मोरियार या मौर्य उपनिवेश तिनवेवेल्ले जिले में पोदिइयिल हिल के रूप में आगे बढ़े हैं। जैन परंपरा भी चंद्रगुप्त के नाम को मैसूर देश के साथ जोड़ती है। अपने राजनीतिक जीवन के अंत की ओर जैन परंपरा के अनुसार चंद्रगुप्त एक जैन भक्त बन गए और मैसूर के श्रवण बेलगोला में चले गए जहां उन्होंने सिद्धि की और 298 ईसा पूर्व में उनकी मृत्यु हो गई। Chandragupta Maurya Raja Kaise Bane  मौर्य काल के उत्तर-दक्षिण भारत के बीच कौटिल्य के अस्त्रशास्त्र का उल्लेख है। इसी तरह तमिल कवि ममुल्लनार और परनन ने उल्लेख किया है 

चंद्रगुप्त के साम्राज्य का विस्तार

प्लूटार्क और जस्टिन चंद्रगुप्त के अनुसार उसके कब्जे में पूरा भारत था। एचसी रॉयचौधरी के अनुसार, “चंद्रगुप्त मौर्य भारत में एक महान साम्राज्य के पहले historical founder हैं।

इस प्रकार चंद्रगुप्त मौर्य के अधीन मौर्य साम्राज्य उत्तर-पश्चिम में फारस की सीमाओं तक बढ़ा पूर्व में इसमें मगध और शायद बंगाल शामिल था, पश्चिम में यह सौराष्ट्र के पास पश्चिमी समुद्र से घिरा था; दक्षिण में यह मैसूर के चीतलद्रुग जिले और मद्रास के नेल्लोर जिले तक अपनी राजधानी के रूप में पाटलिपुत्र तक विस्तार हुआ। लेकिन यह वचन यथार्थता की चमत्कारोक्ति  प्रतीत होता है। 

चंद्रगुप्त मौर्य का प्रशासन

मेगस्थनीज की इंडिका और कौटिल्य के अर्थशास्त्र के अलावा, अशोक और रुद्रदामन के शिलालेख और दिव्यवदना और मुदर्रक्ष जैसे साहित्यिक स्रोत भी मौर्य प्रशासन पर प्रकाश डालते हैं। चंद्रगुप्त मौर्य न असंग एक महान विजेता और एक साम्राज्य निर्माता थे, बल्कि वे भारत के कुशल और महान प्रशासकों में से एक थे। उन्होंने प्रशासन की बहुत विस्तृत व्यवस्था की थी।

हम इसके बारे में मेगास्थनीज और कौटिल्य के अर्थशास्त्र से जानते हैं।  इन स्रोतों के आधार पर हम मौर्य प्रशासन के बारे में एक विचार बना सकते हैं। मौर्य प्रशासन को तीन शाखाओं अर्थात् केंद्रीय प्रशासन, प्रांतीय प्रशासन और स्थानीय प्रशासन में विभाजित किया जा सकता है।

केंद्रीय प्रशासन

केंद्रीय प्रशासन में राजा, मंत्रियों की परिषद, सलाहकार और अन्य उच्च अधिकारी शामिल थे।

राजा

इन सभी शक्तियों के साथ, राजा सभी व्यावहारिक उद्देश्यों के लिए एक जाग्रत despot के रूप में काम कर रहा था। मौर्य राजा एक पूर्ण शासक थे। वह प्रशासन के शीर्ष पर था। राजाओं का उनका आदर्श हितैषी था। प्रशासन का निश्चित  लोगों का कल्याण करना था। Chandragupta Maurya Raja Kaise Bane वह कार्यकारी, कानून देने वाले और सर्वोच्च न्यायाधीश के प्रमुख थे। वह सर्वोच्च कमांडर-इन-चीफ भी थे।

मंत्री परिषद और अन्य उच्च अधिकारी

प्रशासन के काम में राजा को मंत्रिपरिषद द्वारा अनुदान दी जाती थी, जिन्हें ज्ञान के लिए जाना जाता था। मन्त्री परिषद के अलावा, परामर्शदाता के एक छोटे से समुदायको मन्त्रियों के रूप में जाना जाता था Chandragupta Maurya Raja Kaise Bane  जो आंतरिक कैबिनेट का गठन करते थे। अन्य उच्च अधिकारी भी थे जिन्होंने प्रशासन की विभिन्न शाखाओं का पर्यवेक्षण किया।

वे सम्भारत (कलेक्टर जनरल), सानिध्य (कोषागार के प्रभारी अधिकारी), दरवारिका (गेट कीपर), अंटार्विसिका (हरम के प्रभारी अधिकारी), प्रशांति (कारागार महानिरीक्षक), प्रदेस्त्री (संभागीय आयुक्त), नायक (सिटी कांस्टेबल) थे। , पूरा (राजधानी के गवर्नर), व्य्वहारिका (मुख्य न्यायाधीश), मन्त्री परिषद उपाध्याय (परिषद के अध्यक्ष) दंडोपाला (पुलिस प्रमुख), दुर्गापाल (गृह रक्षा के प्रभारी अधिकारी) और अंतपाला (सीमा सुरक्षा के अधिकारी)।इसमें मन्त्रिन (प्रधान मंत्री), पुरोहित (शाही पुजारी), सेनापति (सेनापति-प्रमुख) और युवराज (क्राउन राजकुमार) शामिल थे।

विभिन्न विभाग

कौटिल्य के अस्त्रशास्त्र से ज्ञात होता है Chandragupta Maurya Raja Kaise Bane कि मंत्रियों द्वारा प्रबंधित लगभग 26 विभाग थे। विभिन्न विभाग कोस्ट (ट्रेजरी), अकारा (खान), लोहा (धातु), लौसाना (मिंट), लावण (नमक), सुवर्णा सेना के अधीक्षक जो पाट (पैदल सेना) के हैं, अश्व (अश्व), हस्ति (हाथी) और रथ (रथ) इस प्रकार मौर्य प्रशासन एक उच्च केंद्रीकृत नौकरशाही था। मंत्रियों ने बेरोजगारों, विधवाओं, निराश्रितों, अनाथों, और संगीतकारों आदि के कल्याण के लिए अपने कर्तव्यों का निर्वहन किया। 

न्याय प्रशासन

गाँव के मुखिया और गाँव के बुजुर्ग आमतौर पर अपने स्थानीय क्षेत्रों में छोटे विवादों को सुलझाते थे। Chandragupta Maurya Raja Kaise Bane नागरिक और अपराधी दो प्रकार के उच्च न्यायालय थे।दीवानी अदालतों को “धर्मस्थानिया” अदालत के रूप में जाना जाता था। दीवानी न्यायालयों की अध्यक्षता तीन अमित्यों द्वारा की जाती थी,

जिन्हें धर्मशास्त्र नामक तीन विद्वान ब्राह्मणों द्वारा सहायता प्राप्त थी। ये अदालतें विवाह, तलाक, दहेज, संपत्ति की विरासत, मकान, भूमि, सीमा, ऋण, अनुबंध आदि के विवादों के मामलों को निपटाती हैं।राजा न्यायिक प्रशासन के शीर्ष पर था। गाँव के न्यायाधिकरणों में सबसे नीचे न्यायालयों की श्रृंखलाएँ थीं आपराधिक अदालतों को “कंटकसोधन” अदालतों के रूप में कहा जाता है,Chandragupta Maurya Raja Kaise Bane जिनकी अध्यक्षता तीन अमात्य लोग करते थे। जासूसों और एजेंटों की। मेगस्थनीज के अनुसार, सजा की मौर्य व्यवस्था बहुत गंभीर थी और अपराध अत्यंत दुर्लभ थे। जुर्माना, बेगार, कोड़े मारना, मार-पीट और फाँसी की सजा के तरीके थे। इन अदालतों ने देश के लिए हत्यारों, देशद्रोहियों, राजनीतिक अपराधियों, चोरों, कानून के उल्लंघनकर्ताओं और अपराधियों की कोशिश की।

कौटिल्य अत्याचार के कई प्रचलित तरीकों को संदर्भित करता है, और सुझाव देता है कि, “जिनके अपराध को सही माना जाता है उन्हें यातना के अधीन किया जाएगा।

सेना

मेगस्थनीज युद्ध कार्यालय को संदर्भित करता है जिसमें 30 सदस्य शामिल थे। 30 सदस्यों को प्रत्येक के 5 सदस्यों के 6 बोर्डों में विभाजित किया गया था। पहला बोर्ड नौसेना का प्रभारी था। दूसरा बोर्ड परिवहन, कमिश्ररी और सेना सेवा का प्रभारी था। तीसरा बोर्ड पैदल सेना का प्रभारी था। Chandragupta Maurya Raja Kaise Bane  चौथा बोर्ड घुड़सवार सेना के साथ निपटा।

पांचवां बोर्ड युद्ध-रथों से संबंधित था और छठा बोर्ड हाथियों का प्रभारी था। कौटिल्य के अस्त्रशास्त्र से ज्ञात होता है कि पूरी सेना ने सेनापति या सेनापति के नियंत्रण में काम किया था। सेनापति के बगल में रैंक के अन्य सेना अधिकारी थे जैसे प्रस्ता, नायक और मुखिया। Chandragupta Maurya Raja Kaise Bane  साम्राज्य की सीमाओं के साथ-साथ उसकी राजधानी की भी रक्षा करने के लिए किले थे।

स्थानीय प्रशासन

जैसा कि राज्य के राजस्व का संबंध है, करों को नकदी और प्रकार दोनों में एकत्र किया गया था। स्थानीय अधिकारियों ने राजस्व एकत्र किया। भू-राजस्व राज्य की आय का मुख्य स्रोत था। कौटिल्य ने वित्त पर जोर दिया।Chandragupta Maurya Raja Kaise Bane उनके अनुसार, “सभी उपक्रम वित्त पर निर्भर करते हैं। इसलिए, ट्रेजरी पर सबसे अधिक ध्यान दिया जाएगा।

राजस्व विभाग के प्रभारी अधिकारी को समहारता कहा जाता था। इस प्रकार एकत्र किया गया राजस्व राजा के महल, अदालत, सेना के अधिकारियों और सड़कों, भवनों, सिंचाई जैसे सार्वजनिक कार्यों पर भी खर्च किया जाता था।

प्रांतीय प्रशासन

कौटिल्य के अस्त्रशास्त्र में सम्राट, अर्थात, गृहस्वामी, व्यापारी, तपस्वियों, विषियों, विभिन्न प्रकार की महिलाओं द्वारा नियुक्त विभिन्न प्रकार के जासूसों का उल्लेख है।मगध पर सीधे सम्राट का शासन था, अन्य चार प्रदेशों में राज्यपालों या वाइसराय का नियंत्रण था, जो सीधे सम्राट के लिए जिम्मेदार थे। Chandragupta Maurya Raja Kaise Bane  प्रशासन के काम के लिए अधिकारियों के कई वर्ग भी नियुक्त किए गए थे।

चंद्रगुप्त मौर्य द्वारा प्रशासन के सुचारू संचालन के लिए एक अच्छी तरह से विनियमित जासूसी प्रणाली शुरू की गई थी। प्रशासनिक सुविधा के लिए व्यापक मौर्य साम्राज्य को मगध, तक्षशिला, स्वर्णगिरि सोंगिरी और तोसली (धौली) और कौशांबी जैसे पांच प्रांतों में विभाजित किया गया था। Chandragupta Maurya Raja Kaise Bane तोसली अशोक द्वारा जीता गया एकमात्र क्षेत्र था, इसलिए यह संभव है कि तोसली को छोड़कर अन्य चार क्षेत्रों को चंद्रगुप्त मौर्य ने जीत लिया था।

अशोक के समय के दौरान, प्रांतीय प्रशासन लोगों के कल्याण के लिए अधिक विस्तृत हो गया क्योंकि यह उनके कथन से स्पष्ट है, “सभी पुरुष मेरे बच्चे हैं और जैसा कि मैं अपने बच्चों के लिए कामना करता हूं कि वे हर तरह की समृद्धि और खुशी का आनंद लें, इसलिए यह भी करें मैं सभी पुरुषों के लिए समान इच्छा रखता हूं। ”

स्थानीय प्रशासन

यह प्रशासनिक सुविधा के लिए था, कि प्रांत को कुछ जनपदों या जिलों में विभाजित किया गया था, वित्त और आंतरिक मंत्री, शांहकार और गोप, सामहर्ता के लिए जिम्मेदार थे। गाँव प्रशासन की सबसे निचली इकाई थी। ग्रामिक ग्राम प्रधान थे, जिन्होंने गाँव के बुजुर्गों की मदद से प्रत्येक गाँव का प्रशासन चलाया। गांवों को स्वायत्तता मिली। स्थानीय प्रशासन प्रत्येक जनपद को कुछ गणों या स्तानों में और प्रत्येक चरण को कुछ गांवों में विभाजित किया गया था। Chandragupta Maurya Raja Kaise Bane  स्तानिकों और गोपों ने जिले के प्रशासन को आगे बढ़ाया। जबकि चरणिका एक बड़ा जिला या जनपद का प्रभारी था, गोपा पांच से दस गांवों के प्रभारी थे।

नगरपालिका प्रशासन

मेगस्थनीज ने तीस सदस्यों के एक नगरपालिका आयोग द्वारा पाटलिपुत्र की राजधानी शहर के प्रशासन का विवरण दिया है। वे प्रत्येक पांच सदस्यों के साथ छह बोर्डों में विभाजित थे। नगरपालिका प्रशासन सिक्स बोर्ड क्रमशः निम्नलिखित कर्तव्यों के साथ भरोसेमंद थे।

लेकिन इन सभी कार्यों के अलावा, आयोग ने अपनी सामूहिक जिम्मेदारी में, सामान्य हित के मामलों की देखभाल की, जैसे कि बाजार, बंदरगाह, मंदिरों की निगरानी और सार्वजनिक भवनों को उचित मरम्मत में रखना।

एफडब्ल्यू थॉमस के अनुसार, नगरपालिका प्रशासन की यह प्रणाली शहर से शहर में भिन्न थी। लेकिन कौटिल्य इस नगरपालिका प्रशासन के बारे में चुप है। उन्होंने उल्लेख किया है कि नगर प्रशासन एक अधिकारी का प्रभारी था, जिसे नागरका कहा जाता था।

पहले बोर्ड को औद्योगिक कला से संबंधित हर चीज की देखभाल करनी थी; दूसरा बोर्ड विदेशियों की देखभाल करने के अलावा, सराय को नियंत्रित करने और शहर में निवासी की देखभाल करने के अलावा; जन्म और मृत्यु को रिकॉर्ड करने वाला तीसरा बोर्ड; व्यापार और वाणिज्य के अधीक्षण के लिए चौथा बोर्ड; निर्मित लेखों की देखरेख करने वाला पांचवा मंडल बिक्री पर लगाए गए दस प्रतिशत के कर को इकट्ठा करने वाला छठा बोर्ड। इस प्रकार मौर्य साम्राज्य ने प्रबुद्ध निरंकुशता पर आधारित एक बहुत ही ध्वनि प्रशासन का आनंद लिया।

चन्द्रगुप्त मौर्य की कितनी पत्नियां थी?

चंद्रगुप्त मौर्य ने तीन बार विवाह किया था, जिसमें पहली पत्नी का नाम दुर्धरा था, जिससे चंद्रगुप्त मौर्य को बिन्दुसार प्राप्त हुआ। चंद्रगुप्त मौर्य का दूसरा विवाह सेल्युकस की पुत्री कार्नेलिया हेलेना से हुआ था, इनसे चन्द्रगुप्त मौर्य को एक पुत्र प्राप्त हुआ, जिसका नाम जस्टिन था। ऐसा कहा जाता है कि चन्द्रगुप्त मौर्य के तीसरी पत्नी का नाम चंद्र नंदिनी था।

FAQ

Ques: दुर्धरा किसकी पुत्री थी?

दुर्धरा नंदवंशियो के पूर्वज महाराज घनानंद की पुत्री थी।

Ques: चन्द्रगुप्त मौर्य की मृत्यु कब हुई थी ?

चंद्रगुप्त मौर्य की मृत्यु 297 ईशा पूर्व के आसपास आध्यात्मिक संत गुरु भद्रबाहु के मार्गदर्शन में हुई थी।

Ques: चंद्रगुप्त मौर्य का जन्म कब हुआ था?

चंद्रगुप्त मौर्य का जन्म ईसा मसीह के जन्म से लगभग 340 वर्ष पूर्व हो चुका था। उनका जन्म किसी तिथि को पाटलिपुत्र में हुआ था।

Ques: चंद्रगुप्त मौर्य किसका पुत्र था?

इनकी माता की बात करें तो इनका नाम मुरा था। वही उनके पिता का नाम सर्वार्थसिद्धि था। यह बिंदुसार जी के उत्तराधिकारी थे।

Ques: चन्द्रगुप्त मौर्य के पिता कौन थे?

चन्द्रगुप्त मौर्य के पिता का नाम सर्वार्थसिद्धि था।

Ques: चन्द्रगुप्त मौर्य की पत्नी का क्या नाम था?

ऐसा कहा जाता है कि चंद्रगुप्त मौर्य ने तीन बार विवाह किया था, जिसमें पहली पत्नी का नाम दुर्धरा था जिससे चंद्रगुप्त मौर्य को बिन्दुसार प्राप्त हुआ।

Ques: चन्द्रगुप्त मौर्य के गुरु कौन थे?

चन्द्रगुप्त मौर्य के गुरु महा पंडित चाणक्य थे।

Ques: मौर्य साम्राज्य की स्थापना किसने की थी?

मौर्य साम्राज्य की स्थापना चन्द्रगुप्त मौर्य की थी।

Ques: चन्द्रगुप्त मौर्य का कार्यकाल?

चन्द्रगुप्त मौर्य ने 322 से 298 ईसा पूर्व के मध्य शासन किया था। चंद्रगुप्त मौर्य ने लगभग 23 वर्षों के सफल शासन करने के पश्चात सभी प्रकार के सांसारिक सुख इत्यादि मोह मायाओं को त्याग दिया और इसके पश्चात वे खुद को एक जैन साधु में बदल दिए।

Ques: चंद्रगुप्त मौर्य का उत्तराधिकारी कौन हुआ?

बिंदुसार चंद्रगुप्त मौर्य का उत्तराधिकारी हुआ था।

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