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Co-education kya hai

 

दोस्तों आज हम आपके लिए काफी दिलचस्पी आर्टिकल लेकर आये है co-education के बारे में बातएंगे और दोस्तों आपको इसके बारे में जानकरी नहीं मालूम तो आप जरूर यह हमारा लेख जरूर पढ़े और दोस्तों आपको काफी अच्छे से समझ आ जायेगा क्योकि हमने काफी सरल भाषा में यह लेख प्रस्तुत किया है तो अब शुरू करते है यह हमारा लेख co-education kya hai

Co-education kya hai

co-education kya hai सह शिक्षा का स्पष्ट रूप से यह मतलब है कि एक ही छत पर लड़के और लड़कियों को एक साथ बिठाकर पढ़ाया जाता था आजादी के बाद से ही भारत में बच्चें व बच्चियों को एक ही स्कूल में एक ही कक्षा में साथ शिक्षा देने की इंतज़ाम कराया गया और साथ जो आज तक जारी हैं. मगर कुछ रुढ़िवादी विचारधारा से पकड़े हुए लोग इसका विरोध करते रहे हैं.आज के समय में सरकारी और निजी बालिका विद्यालय भी खोले गये हैं,  केवल लड़कियों को ही शिक्षा दी जाती हैं.देश धीरे धीरे बदलाव आने लगे और सभी लोग सह शिक्षा के संबध में बदलावों को भी मानने लगे co-education kya hai

प्राथमिक शिक्षा में अध्यापिका की भूमिका –

प्राथमिक शिक्षा में अध्यापिका की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। परिवार से निकलकर विद्यालय के नए बातावरण में प्रवेश करने वाले शिशु के लिए अध्यापिका माता और शिक्षक का कर्तव्य निभाती है। यदि शिशु का विभाजन बालक या बालिका में करके अलग से शिक्षा का आयोजन किया गया तो पुरुषों के अध्यापन में न वह सहृदयता होगी, न उनमें बालक की प्रवृत्ति-परिवर्तन के लिए सिद्धता होगी जो एक अध्यापिका में होती है। co-education kya hai सहशिक्षा छात्रों में प्रतिस्पर्धा लाती है। यहाँ छात्र-छात्राओं से और छात्राएँ छात्रों से आगे बढ़ने की प्रयत्न करते हैं। यह स्वस्थ प्रतिस्पर्धा उनके अध्ययन, चिंतन, मनन को बलवती बनाती है।

सहशिक्षा और समाज

शिक्षा में सह शिक्षा के प्रति व्यापक स्तर पर नकारात्मकता.जब हम छोटे थे तो हम सभी पांचवी तक स्कूलों में साथ साथ ही बैठा करते थे, तब लडके लड़की में कोई भेद नहीं समझा जाता था. मगर छठी से दसवीं और उसके बाद तो लडकों के लिए अलग और लडकियों के लिए अलग स्कूल तक खोल दिए जाते हैं.co-education kya hai

प्राचीन काल में भी लिंग के आधार पर उतना भेदभाव नहीं किया जाता था. जिन विद्यालयों में आज भी सहशिक्षा की व्यवस्था नहीं है वहां आप पाएगें कि बच्चों के सामाजिक स्तर बेहद निम्न रहेगे व उनमें लिंग के प्रति भेदभाव का नजरिया जन्म लेगा.co-education kya hai

जिस तरह हम घर में सभी मिलजुलकर रहते हैं उसी प्रकार कक्षा में भी या तो हमारे दोस्त पड़ोसी या भाई बहिन ही होते हैं. लम्बे समय तक साथ साथ पढने से एक आपसी जुड़ाव भी पैदा होता हैं.

सहशिक्षा में भी बालक बालिकाओं को एक ही स्थान पर शिक्षा ग्रहण करनी होती हैं. इससे सबसे अधिक लाभ लडकियों को होता हैं वे खुद को दुर्बल नारी स्वभाव यथा लज्जा, झिझक अबला पन तथा हीन भावना से आजाद करवा पाएगी तथा एक खुले रूप में शिक्षा प्राप्त कर सकेगी.co-education kya hai

सह शिक्षा का महत्व –

सह-शिक्षा व्यक्तित्व, नेतृत्व विकास के साथ-साथ संप्रेक्षण क्षमता में सहायक है। वर्तमान युग में सह-शिक्षा आवश्यक है। सह-शिक्षा प्राप्त करने से विद्यार्थी अपने जीवन में अधिक सफल रहते हैं। उनका कहना है कि हम पुरुषों और महिलाओं को हर संभव तरीके से एक साथ काम कर रहे हैं। जहां एक ऐसे समाज में रह रहे हैं,co-education kya hai तो हम बहुत शुरुआत यानी बचपन से एक की धारणा में इस माहौल विकसित करने की जरूरत है। सहशिक्षा से हमारे देश की अर्थ-व्यवस्था भी सुदृढ़ होगी। सहशिक्षा में लड़के-लड़कियों के लिए अलग-अलग विद्यालयों की आवश्यकता नहीं होगी, इससे बचे हुए पैसे को दूसरे कामों में लगाया जा सकता है जो कि सह शिक्षा के महत्व को दर्शाता है।

Advantages of Co Education

आज के समय में वैज्ञानिक युग में जहाँ एक तरह स्त्री पुरुष सामान समझने के विषय में बात कर रहे  तो दूसरी तरफ वे ही लोग सहशिक्षा की व्यवस्था को सवाल करते हैं. सहशिक्षा की व्यवस्था हमारे देश में सदियों से चली आ रही हैं. जिसके तहत बच्चें बच्चियां साथ साथ गुरुकुलों में पढ़ा करते थे.

भारत में मध्यकाल से पूर्व तक स्त्री पुरुष के विषय में इतना भेदभाव नहीं था. मगर मुस्लिम आक्रान्ताओं की बुरी नजर का शिकार बनी बालिकाओं को घर में पर्दा प्रथा तक सिमित कर दिया. एक लम्बे समय तक सहशिक्षा के इस विराम के चलते स्त्री पुरुष के भेद को जन्म दिया जो आज तक लोगों के दिमाग में रसी बसी हैं.

Co Education Disadvantages

सह शिक्षा प्रणाली की आलोचना करने वाले न सिर्फ भारत में ही बल्कि दुनियां के काफी जगहों में इस सिस्टम को चुनौती मिलती रही हैं. पूर्वाग्रह की मानसिकता से ग्रस्त लोगों का तर्क होता हैं कि सहशिक्षा के चलते लड़के लड़की एक दूसरे से आकर्षित होने लगेगे इससे उनका शिक्षा में मन नहीं लगता हैं.

वे पढ़ाई का छोड़कर  प्रेम प्रसंग के संगत में पड़ जाएगे और कुछ लोग मानते हैं कि लड़कियाँ बेहद शर्मीले स्वभाव की होती हैं जिसके कारण व कक्षा में आजादी के साथ नहीं पढ़ सकती हैं. उनका मानना है कि लड़कियों के लिए अलग से विद्यालयों की स्थापना हो जिससे वे पूर्ण स्वतंत्रता के साथ शिक्षा प्राप्त कर सके

सहशिक्षा पर भाषण

स्त्री और पुरुष मिलकर ही समाज बनाता है  और हम घर परिवार में साथ साथ रहते हैं. भारतीय शिक्षा प्रणाली में सहशिक्षा के रूप में देखने को मिलती हैं. जिसके तहत एक ही क्लाश में लड़के लड़की साथ बैठकर पढ़ते हैं. जिनमें भी दोनों की कतार अलग अलग होती हैं.

एक अंग्रेज महोदय का मानना है कि स्त्री के पास बैठकर पुरुष अध्ययन नहीं कर सकता, यौन आकर्षण के चलते दोनों शिक्षा की तरफ ध्यान नहीं दे पाते हैं. उन्ही की बात को माना जाए तो क्या यह सम्भव है कि एक पुरुष को वही अध्ययन करना चाहिए जहाँ कोई स्त्री नहीं हो, ऐसे घर में बसना चाहिए जहाँ स्त्री का नाम तक न हो पांच से दस साल के बच्चें जो अपने भाई बहिनों या पड़ोसियों के साथ एक पारिवारिक वातावरण में शिक्षा पाते हैं. इस उम्र  के बच्चों के लिए ध्यान भटकने जैसा कोई विषय नहीं हो सकता, उच्च शिक्षा में सह शिक्षा के विषय इस तरह के तर्क अवश्य माने व समझे जा सकते हैं हम कई बार अपने आस-पास तथा समाचार पत्रों में भी खबरे पढ़ते है जिनमें छात्र छात्राओं के प्रेम के किस्से सह शिक्षा व्यवस्था पर सवाल करने के अवसर पैदा करते हैं.

जबकि ऐसा तो विद्यालयों के बाहर भी बड़ी संख्या में होता हैं  साथ ही  बालिकाओं  के लिए अलग विद्यालयों में भी शर्मनाक घटनाएं होती आई हैं. विद्यालय प्रशासन की खामियों के चलते इस प्रकार की शर्मसार घटनाएं अवश्य ही बच्चों के दिमाग में गलत चीजे पैदा होने लगती है। सह शिक्षा के महत्व के सम्बन्ध में भी लोगों के अलग अलग विचार हैं. कुछ लोग मानते है कि सह शिक्षा के चलते लम्बे समय तक साथ पढने से विपरीत लिंगी आकर्षण खत्म होने लगता है और मन उदास होने लगता है और बच्चें अपने साथियो की ओर ध्यान देने की बजाय अपने भविष्य के प्रति चिंतित रहता हैं. भारत जैसे देश में जहाँ विद्यालय पहले से कम हैं यदि भवन भी बने है तो वहां शिक्षकों तथा उचित शिक्षण व्यवस्था की कमी हैं ऐसे में लड़के तथा लड़कियों के लिए अलग विद्यालयों की स्थापना आर्थिक दृष्टि से फिजूल हैं. तथा भारत में सह शिक्षा की व्यवस्था के लिए भी कोई मध्यम मार्ग निकालना चाहिए लड़के लड़कियों के साथ पढने से उनकी आपसी समझ बढ़ती हैं. जो आगे चलकर जीवन में काफी सहायक सिद्ध होती हैं. यदि किसी माता पिता के बेटे बेटियां एक ही विद्यालय में पढ़ती है तो अभिभावकों के लिए भी समस्याएँ कम हो जाती हैं. बच्चे भी साथ पढने आने जाने में सुरक्षित महसूस करते हैं सह शिक्षा के विषय में उठ रहे सवालों के दो निदान हो सकते हैं एक तो यह कि रुढ़िवादी सोच के लोग अपनी सोच में बदलाव लाए कि समाज में बदलाव आ पाएगा. जब बेटे बेटी का भेद खत्म हो. दूसरा यह कि सह शिक्षा के विषय में कुछ सुधार कर मध्यम मार्ग को अपनाया जाए जो सभी को स्वीकार्य भी हो प्राथमिक तथा उच्च प्राथमिक कक्षाओं तक सहशिक्षा की व्यवस्था को बरकरार रखते हुए उच्च शिक्षा में बालिकाओं के लिए अलग विद्यालय खोलकर भी आलोचकों को संतुष्ट किया जा सकता हैं तेजी से बदलता समाज सहशिक्षा के विचार को वैसे भी स्वीकार कर चुका हैं. जिसका नतीजा हमें छात्रों के समान ही छात्राओं की सहभागिता तथा विभिन्न बोर्ड कक्षाओं के टोपर में बालिकाओं का शुमार होना निश्चय ही भारत में सह शिक्षा की अभूतपूर्व सफलता हैं.


निष्कर्ष
दोस्तों आज का भारतीय, चाहे वह किसी भी आर्थिक स्तर पर जीवनयापन कर रहा हो, सहशिक्षा से शिक्षा व्यवस्था में खर्च की बहुत बचत होती हैं। और दोस्तों आपको यह लेख समझ आया है तो अपने दोस्तों तक जरूर पहुचाये जिससे लोगो में जागरूकता फैले और ऐसे ही हम दिलचस्प ब्लॉग लाते रहेंगे
धन्यवाद

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