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हड़प्पा सभ्यता से जुड़ी अनसुनी बातें जो आप अभी तक नहीं जानते

हड़प्पा सभ्यता से जुड़ी अनसुनी बातें जो आप अभी तक नहीं जानते: सिन्धु घाटी सभ्यता ( हड़प्पा संस्कृति ) का रहस्यमय इतिहास (History) 68000 Year पुराना है जिनमे से कई और ऐसे कई सारे शहर की तलाश हो चुकी है जो की प्राचीन भारत के भिन्न-भिन्न हिस्सों में फैले हुए थे और आज इसके कुछ ऐसे हिस्से पाकिस्तान और अफगानिस्तान में भी पाए गये हैं। इस सभ्यता की खास बात यह है की यह दूसरी सभ्यताओं की तौल में तकनीकी रूप से अलग है और आगे जा चुकी है।





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हड़प्पा सभ्यता की प्रमुख विशेषताएं

सबसे पुरानी सभ्यता

सबसे पुरानी सभ्यता मेसोपोटामिया है लेकिन Recently में आईआईटी-खड़गपुर और Indian Archeology सर्वेक्षण विभाग (एएसआई) के Scientists ने कुछ ऐसे सबूतों का स्पष्टीकरण किया है जिससे की यह स्पष्ट होता है हड़प्पा सभ्यता से जुड़ी अनसुनी बातें जो आप अभी तक नहीं जानते की सिंधु घाटी की सभ्यता 5,500 वर्ष जैसा की पहले माना गया था नही बल्कि कम से कम 8000 Year पुरानी है।25 मई, 2016 को माननीय Nature Journal जर्नल में प्रकाशित इस तलाश में माना गया है की मिस्र और मेसोपोटामिया सभ्यताओं की तौल में ही नही बल्कि हड़प्पा सभ्यता पूरी दुनिया में सबसे पुरानी सभ्यता है।

इनकी आबादी 50 लाख से भी अधिक थी

सिंधु घाटी सभ्यता (Indus Valley Civilization) की कुल आबादी Five Lakh से अधिक थी जो की New Zealand की Current Population की तौल में अधिक है जिनमे से अधिकतर लोग कारीगर और व्यापारी थे।

 हड़प्पा सभ्यता का नामकरण

पहली बस्तियां सिंधु घाटी के तट पर थीं, इसलिए पुरातत्वविदों ने इसे ‘सिंधु घाटी सभ्यता’ नाम दिया। हालांकि, सिंधु और इसकी भिन्न नदियों के आसपास केवल 100 जगहों पर पाए गये हैं जबकि 500 ​​से ज्यादा Sites की तलाश घग्गर-हकरा घाटी जो की लंबे Time से खोई हुई घाटी , सरस्वती मानी जाती है अब, कई सारे पुरातत्वविदों ने इसे ‘सिंधु-सरस्वती सभ्यता’ के रूप में बुलाया जाता है, हड़प्पा सभ्यता से जुड़ी अनसुनी बातें जो आप अभी तक नहीं जानते जो की दोनो नदियों के नाम पर Based ित है। जबकि कई लोग ‘हड़प्पा सभ्यता’ नाम को पसंद किया करते हैं, जो पहले शहर के नाम पर Based था

अब तक 1056 शहरों की तलाश हो चुकी है

1,056 से अधिक हड़प्पा शहर और बस्तियों की खोज की गई जिनमें से 96 जगहों की खुदाई की गई है। हड़प्पा सभ्यता से जुड़ी अनसुनी बातें जो आप अभी तक नहीं जानते वे ज्यादातर सिंधु और घग्गर-हकरा नदियों और उनकी भिन्न नदियों के आसपास फैले हुए हैं। जिनमे ढोलवरिया, राखीगढ़ी, लोथल, कालीबंगन हड़प्पा और मोहनजोदारो जैसे प्रसिद्ध शहर भी शामिल हैं।

बच्चों का शहर

जब हड़प्पा और मोहनजोदड़ो की खुदाई की गयी थी, तो वहां पासा, पत्थर, सीटी और कई सारे ऐसे प्रकार के खिलौने पाए गए थे। हड़प्पा सभ्यता से जुड़ी अनसुनी बातें जो आप अभी तक नहीं जानते इससे उन्हें लगा कि उन्होंने उन शहरों की तलाश की थी जहां के अधिकतर निवासी बच्चे थे।

हड़प्पा काल में शतरंज जैसा खेल

कई प्रकार के खिलौने पाए गये हैं जिससे पता चलता है की वहाँ के लोगों को खेल खेलना काफी पसंद था लेकिन आपको यह जानकर आपको हैरानी होगी की शतरंज जैसा खेल भी उस जमाने में खेला जाता था।

4000 वर्षीय सिंधु घाटी ईंटों से बना रेलवे ट्रैक

भारत में ब्रिटिश शासन के दौरान, ब्रिटिश इंजीनियर कराची से लाहौर तक रेलवे ट्रैक का निर्माण कर रहे थे। जब ट्रैक बढ़ाने के लिए Materials की कमी पड़ी तो उन्होंने इसके लिए हड़प्पा के आसपास के खंडहरों से ईंटें इकट्ठा कीं। उन्होंने इन 4000 वर्ष पुरानी ईंटों का इस्तेमाल करके 150 किमी रेलवे ट्रैक का निर्माण किया।

दुनिया का पहला योजनापूर्ण शहर

सिन्धु घाटी के लगभग सभी शहर योजनापूर्ण तरीके से एक Grid Pattern में डिज़ाइन किये गये हैं। सड़कों की दिशा और चौड़ाई को ध्यानपूर्वक बनाया गया था, हड़प्पा सभ्यता से जुड़ी अनसुनी बातें जो आप अभी तक नहीं जानते सड़कों के आसपास बाजार और अन्य दुकानों आदि के लिए पर्याप्त जगह की प्रबंध थी।

वे अपने Time से आगे थे

सिन्धु घाटी सभ्यता में शहरों और गावों का निर्माण काफी ही योजनापूर्ण तरीके से किया गया था जो उस Time के दूसरी प्राचीन सभ्यताओं में दिखाई नही देते। सभी शहर एक ही पद्धति से बनाई गई थी। Town Planning  शहरों तक सीमित नहीं थी, प्रत्येक शहर और गांव एक ही Grid Pattern से बने थे हड़प्पा सभ्यता से जुड़ी अनसुनी बातें जो आप अभी तक नहीं जानते और प्रत्येक घर का निर्माण एक ही आकार के ईंट से होता था। सभी घरों के लिए ईंटें समान थीं। जल निकासी और प्रबंध के लिए भी विशेष प्रबंध की गयी थी।

अधिकतर घर दो मंजिला या तीन मंजिला होते थे

हड़प्पा सभ्यता के लोगों के पास राजमिस्त्री हुआ करते थे जो की ईंटों को जोड़कर विशाल संरचना बना सकते थे यही कारण यहाँ है की लोगों के घर दो मंजिला या तीन मंजिला हुआ करते थे। हड़प्पा सभ्यता से जुड़ी अनसुनी बातें जो आप अभी तक नहीं जानते

हड़प्पा काल के घरों में अटैच्ड बाथरूम व फ्लश टॉयलेट हुआ करते थे

हड़प्पा संस्कृति के लगभग सभी घरों में पानी की Service के साथ उस Time के अनुसार अत्याधुनिक स्नानागार और शौचालय होते थे जिनमे निकासी और साफ़ सफाई की भी प्रबंध की गयी थी।

मोहनजोदड़ो का विशाल स्नानागार

मोहनजोदड़ो की खुदाई में एक विशाल स्नानागार पाया गया है। यह 2.5 मीटर गहरा, 7 मीटर लम्बा और चौड़ा था। प्रवेश द्वार के रूप में दो चौड़े सीढ़ियां थीं, हड़प्पा सभ्यता से जुड़ी अनसुनी बातें जो आप अभी तक नहीं जानते तालाब में एक छेद भी है जहां से पानी निकलता है। सभी दीवारों को gypsum plaster के साथ पतले ईंटों और मिट्टी से बनाया गया था।

दुनिया के पहले दंत चिकित्सक

सन 2001 में, मेहरगढ़, पाकिस्तान के दो लोगों के अवशेषों का अध्ययन करने वाले पुरातत्वविदों ने पाया कि यह सिंधु घाटी सभ्यता के लोग, शुरूआती में हरप्पन काल से ही आद्य-दंत चिकित्सा  के ज्ञानी थे। हड़प्पा सभ्यता से जुड़ी अनसुनी बातें जो आप अभी तक नहीं जानते Nature Journal में प्रकाशित Article के अनुसार मेहरगढ़ में एक जीवित व्यक्ति में मानव दांतों के ड्रिलिंग का पहला सबूत पाया गया था।

उन्होंने नाप-तौल की सटीक तकनीक भी विकसित की थी

Scientists ने उस Time इस्तेमाल होने वाले कुछ माप यंत्रों की तलाश की है जिनका इस्तेमाल लम्बाई नापने, वजन तौलने आदि में किया जाता था। नाप-तौल के कई मानक भी निर्धारित किये गये थे, 0.005 इंच को सटीक से नापा जा सकता था। हड़प्पा सभ्यता से जुड़ी अनसुनी बातें जो आप अभी तक नहीं जानते यही नही, पुरातत्वविदों को कुछ पत्थर के cubes भी मिले हैं जो की स्पष्ट रूप से वजन तौलने के लिए तैयार किये गये हैं, जिनसे 0.05 से लेकर 500 Unit तक के भार को तौला जाता है।

मोहन जोदड़ो में सड़कों व गलियों में कूड़ेदान की प्रबंध थी

पुरातत्वविदों ने ईंट से बने कई containers की पहचान की जो की कचड़े इक्कठे करने के लिए मोहन जोदड़ो की गलियों में लगाए गये थे।

उन्होंने दुनिया का सबसे पुराना sign board बनाया

1999 में ढोलवीरा में, पुरातत्वविदों ने दुनिया का पहला sign board तलाशा है, इस Board में एक लकड़ी के frame में 30 Centimeter के पत्थर से बने Logo थे।

उनको कला और शिल्प के क्षेत्र में महारथ हासिल थी

Harappan civilization के लोग शिल्पकला के मामले में काफी उन्नत थे, खनन के दौरान सिन्धु घाटी से ताम्बे, कांस जैसे कई प्रकार के धातुओं से बनी मूर्तियाँ और Art Work पाई गयीं हैं हड़प्पा सभ्यता से जुड़ी अनसुनी बातें जो आप अभी तक नहीं जानते जिनमे उनके शिल्प को आसानी से देखा जा सकता है।

 सिन्धु सभ्यता की लिपि

(Indus Valley Script) को अभी तक समझा नही जा सका है हड़प्पा संस्कृति में इस्तेमाल किये गये लिपि व लिखावट की विवरण अभी तक नही की जा सकी है

 सिंधु घाटी सभ्यता का अंत कैसे हुआ?

इस सभ्यता की अंत के पीछे का रहस्य से आज भी बना हुआ है। और कोई लोगो को भी नही जानता की यह हड़प्पा सभ्यता का अंत कब और कैसे हुआ था। यह लोगो को मालूम, नहीं होता तो आपको दोस्तों विस्तार से निम्न में बताया गया है

कुछ लोगो का यह भी कहना है की उनकी सैन्य strategies की कमी के कारण मध्य एशिया से भारत-यूरोपीय आदिवासी के आर्यों ने उन पर हमला किया। कुछ लोगों का यह कहना है कि यह एक बड़े मानदंड पर सूखे की वजह खत्म हो गई। वहीँ कुछ लोगों का मानना ​​है कि एक काफी बड़े भूकंप ने घाटी के पथ को बदल दिया, और इस तरह परिस्थिति ने उन्हें कहीं और transferred होने के लिए विवश किया।

सिंधु सभ्यता का काल निर्धारण :-

2350 – 1750 ईo पूo :- सी. जे. गैड
2500 – 1700 ईo पूo :- मार्टिन ह्वीलर
2000 – 1500 ईo पूo :- फेयर सर्विस

3250 – 2750 ईo पूo :- सर जॉन मार्शल के अनुसार
2800 – 2500 ईo पूo :- अर्नेस्ट मैके के अनुसार
3500 – 2700 ईo पूo :- माधो स्वरूप वत्स

कार्बन डेटिंग के Based पर इसका काल निर्धारण करने वाले पहले भारतीय विद्वान धर्मपाल अग्रवाल थे। इन्होंने इसका Time 2300 – 1700 ईo पूo बताया है।

मोहनजोदड़ो

सिंध प्रांत के जिले में सिंधु घाटी के दाएं तट पर स्थित था। 1922 ईo में राखालदास बनर्जी ने इसकी तलाश की। आध्यात्मिक नगर जैसा विख्यात होता है। इसे स्वर्गवासी का टीला, रेगिस्तान का बगीचा, स्तूपों का शहर जैसे अन्य नामों से भी जाना जाता है। इस स्थल का क्षैतिज खुदाई हुआ जिसमे सात स्तर पाए गए। बाढ़ के कारण यह कई बार उजड़ा भी है और बसा भी। यहाँ पर एक अन्नागार मिला है जो सभ्यता की सबसे बड़ी इमरती संरचना है। मलेरिया का सबसे अधिक साक्ष्य यहीं से मिला है। यहाँ से प्राप्त एक मुहर पे सुमेरियन नावों का चित्रण है। चाँदी का सबसे अधिक साक्ष्य यहीं से प्राप्त हुआ। यहाँ चांदी का कलश व शिलाजीत पाया गया।

प्राप्त साक्ष्य – 20 खम्भों वाला सभा भवन, ताँबे का हेयर पिन, कांसे की नर्तकी, वृहत स्नानागार, ईंट के 6 भट्टे

चन्हूदड़ो

चन्हूदड़ो पाकिस्तान के सिंध प्रांत में सिंधु घाटी के तट पर बसा था। इसकी तलाश एन. जी. मजूमदार ने की। यहाँ पर खुदाई 1935 में मैके के मार्गदर्शन में हुआ। इस स्थल की किलेबंदी नहीं की गयी थी। इसे हड़प्पा सभ्यता का औद्योगिक शहर कहा गया।हड़प्पा सभ्यता से जुड़ी अनसुनी बातें जो आप अभी तक नहीं जानते  क्योंकि यह शीप, मनके तथा मुद्रा बनाने का केंद्र था।

प्राप्त साक्ष्य :- सौंदर्य प्रसाधन, हड़प्पा सभ्यता के बाद विकसित हुई झूकर-झाकर संस्कृति के अवशेष, मनके/गुरियाँ बनाने का कारखाना, पकी हुई नालियाँ।

कालीबंगा

कालीबंगा राजस्थान के हनुमानगढ़ / गंगानगर जिले में सरस्वती घाटी के तट पे स्थित था। इसकी तलाश अमलानंद घोष ने की। यहाँ पर खुदाई बी. बी. लाल और वी. के. थापर के मार्गदर्शन में हुआ। कुछ विद्याएँ के अनुसार यह हड़प्पा सभ्यता की तीसरी राजधानी था। जल निकास प्रणाली का त्रुटि था। हड़प्पा सभ्यता से जुड़ी अनसुनी बातें जो आप अभी तक नहीं जानते यहाँ से नालियों की जगह लकड़ी की नालियाँ प्राप्त हुई हैं। पक्की सड़कों के प्रमाण सिर्फ यहीं से प्राप्त हुए हैं। यहीं से अंत्येष्टि संस्कार की तीनों विधियों का पता चलता है। यहीं से भूकंप का सबसे अधिक प्रमाण मिलता है।

प्राप्त साक्ष्य – सात आयत आकृतिवाला यज्ञ वेदियाँ, एक युग्म शवाधान, आक्रामक मुद्रा में वृषभ की मूर्ति, ऊँट की हड्डियाँ, अंडाकार कब्र, बालक की खोपड़ी में 6 छेद जो शल्य चिकित्सा का प्रमाण उपस्थित करता है।

लोथल

लोथल गुजरात के अहमदाबाद जिले में सावरमतीभोगावा घाटी के संगम पर स्थित है। इसे एस. आर. राव ने लघु हड़प्पा या लघु मोहनजोदड़ो कहा। इसकी तलाश एस. आर. राव ने 1954 ईo में की और 1957-58 ईo में यहाँ पर खुदाई किया गया। इसका मिस्र व मेसोपोटामिया के साथ सीधा व्यापार होता था।

प्राप्त साक्ष्य – वृत्ताकार व चतुर्भुज की आकृति का अग्नि वेदियाँ, गोरिल्ला की मृणमूर्ति, ममी, 3 युग्म शवाधान, पंचतंत्र की चालक लोमड़ी की आकृति, चक्की के दो पाट, हाथी दांत की पटरी, रंगाई कुण्ड

बनावली

बनावली हरियाणा के हिसार में घग्गर व उसकी भिन्न नदियों की घाटी में स्थित है। इसे समृद्ध लोगों का शहर भी कहा जाता है। इसकी तलाश 1973 ईo में आर. एस. विष्ट ने की इन्हीं के मार्गदर्शन में यहाँ खुदाई हुआ। यह स्थल तीनो सतह प्राक, विकसित, उत्तर का तथ्य करता है।

प्राप्त साक्ष्य – अग्नि वेदियाँ, मिट्टी का हल, धावनपात्र

धौलावीरा

धौलावीरा गुजरात के कच्छ में मनहर व मानसेहरा नदियों के बीच स्थित है। इसकी तलाश जे. पी. जोशी ने की। यहाँ पर खुदाई 1967-68 में आर. एस. विष्ट के मार्गदर्शन में हुआ। धौला का अर्थ – सफ़ेद, वीरा का अर्थ – कुआं। यहाँ पर एक कुआं मिला है इसी के कारण इसका नाम धौलावीरा रखा गया। यह तीन भागों में विभाजित एक आयत आकृतिवाला नगर था। इस सभ्यता की भारत में स्थित यह दूसरी सबसे बड़ी बस्ती है। यहीं पर इस सभ्यता का स्टेडियम/खेल के मैदान की सिद्धि हुई है। यहाँ की जल प्रबंध प्रबंध विशिष्ट थी। यहाँ से एक विशाल तालाब की सिद्धि हुई है।

प्राप्त साक्ष्य – राज्यसभा का अवशेष, नेवले की पत्थर की मूर्ति

सुरकोटदा

इस स्थल की तलाश प्रथम 1964 में जगपति जोशी ने की। इस स्थल के Final Level पर घोड़े की अस्थियाँ मिली हैं। यहाँ  कब्रगाह की भी सिद्धि हुई है।

रोपड़

रोपड़ पंजाब में सतलज घाटी के तट पर बसा था। इसकी तलाश 1955-56 में यज्ञदत्त शर्मा ने की। यहाँ पर संस्कृति के 5 स्तरीय क्रम की सिद्धि हुई है। यहाँ पर कब्र के नीचे कुत्ते के शवाधान के साक्ष्य मिले हैं।

रंगपुर

रंगपुर गुजरात के अहमदाबाद में मादर घाटी के तट पर स्थित है। इसकी तलाश पहले 1931 में एम. एस. वत्स ने और बाद में 1953 में एस. आर. राव ने की। यहाँ से किसी भी प्रकार की कोई मुद्रा प्राप्त नहीं हुई है।

प्राप्त साक्ष्य – धान की भूसी, कच्ची ईंटों के दुर्ग, नालियाँ, पत्थर के फलक, मृदभांड

आलमगीरपुर

आलमगीरपुर उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले में हिंडन घाटी के Left तट पर स्थित था। यह इस सभ्यता का सबसे पूर्वी स्थल था। 1958 में इस पुरास्थल की तलाश में ‘भारत सेवक समाज‘ का योगदान रहा। इसका खुदाई यज्ञ दत्त शर्मा के मार्गदर्शन में किया गया। सूती कपड़ा/कपास के साक्ष्य यहीं से प्राप्त हुए हैं।

हड़प्पा सभ्यता से सम्बन्धित भिन्न-भिन्न स्थल :

भारत के भिन्न-भिन्न राज्यों में स्थल – जम्मू कश्मीर में माण्डा, हरियाणा में राखीगढ़ी, बनावली, कुणाल, भिर्दाना, मीताथल, पंजाब में रोपड़, बाड़ा, संघोंल, राजस्थान में कालीबंगा शाब्दिक अर्थ – काले रंग की चूड़ियाँ), उत्तर प्रदेश में आलमगीरपुर, रावण उर्फ़ बड़ागाँव, अम्बखेड़ी, गुजरात में लोथल, सुरकोटदा, रंगपुर, धौलावीरा, भगतराव, प्रभाषपाटन, महाराष्ट्र में दैमाबाद, अफगानिस्तान में सुत्कांगेडोर, शोर्तुगोयी, मुन्दिगाक, पाकिस्तान में हड़प्पा, मोहेंजोदड़ो (शाब्दिक अर्थ – स्वर्गवासी / प्रेतों का टीला) ।

  • लोथल से सबसे बड़ी जहाजों की गोदी (डॉक-यार्ड) के साक्ष्य मिले हैं।
  • हड़प्पन लिपि भावचित्रात्मक लिपि है। यह लिपि दायीं से बायीं ओर लिखी जाती है।
  • मोहनजोदड़ो के धान्य कोठार इस सभ्यता की सबसे बड़ी संरचना हैं।
  • भोगवा घाटी के तट पर स्थित लोथल में इस सभ्यता का एकमात्र बंदरगाह स्थित था।
  • सिन्धु क्षेत्र को मेहुल कहा गया है।
  • लोथल व रंगपुर से चावल के साक्ष्य मिले हैं।
  • धौलावीरा इस सिन्धु सभ्यता का सबसे विकसित स्थल था।
  • इस सभ्यता के लोगों को लोहे का ज्ञान नहीं था।
  • इस सभ्यता का काल 2350 से 1750 ई.पू. निर्धारित किया गया है।
  • स्वास्तिक चिन्ह संभवतः हड़प्पा सभ्यता की ही देन है
  • इस सभ्यता में किसी भी प्रकार के मंदिर के अवशेष नहीं मिले हैं।
  • सभ्यता के लोग तलवार से परिचित नहीं थे।
  • यहाँ पर्दा प्रथा व वैश्यावृत्ति प्रचलित थी।
  • सभ्यता की लिपि में 64 मूल चिन्ह व 205-400 अक्षर हैं।

सिन्धु घाटी सभ्यता / हड़प्पा सभ्यता काँस्ययुगीन सभ्यता थी।

यह सभ्यता उत्तर में माण्डा ( जम्मू कश्मीर ) से लेकर दक्षिण में दायमाबाद ( महाराष्ट्र ) तथा पूर्व में आलमगीरपुर ( मेरठ, उत्तर प्रदेश ) से लेकर पश्चिम में सुत्कांगेडोर ( अफगानिस्तान ) तक फैली हुई है।इसकी आकृति त्रिभुजाकार है। हड़प्पा सभ्यता से जुड़ी अनसुनी बातें जो आप अभी तक नहीं जानते

सामाजिक जीवन –

समाज का आधार पर यह एक परिवार था, जोकि मातृसत्तात्मक था। हड़प्पा सभ्यता से जुड़ी अनसुनी बातें जो आप अभी तक नहीं जानते इस समय समाज चार वर्गों में बांटा गया था – योद्धा, विद्वान, व्यापारी शिल्पकार इस सभ्यता के लोग शाकाहारी और माँसाहारी दोनों थे। जुआ खेलना, शिकार करना, नृत्य-संगीत आदि इस सभ्यता के लोगों के आमोद-प्रमोद के साधन थे। और इस सभ्यता के लोगों को कपड़े बनाने का ज्ञान था और यह ऊनी एवं सूती दोनों प्रकार के वस्त्र पहनते थे। समाज में शवों को जलाने एवं दफ़नाने की प्रथा प्रभुत्व-संपन्न थी।

धार्मिक जीवन –

सिन्धु सभ्यता के लोग मातृदेवी की पूजा करते थे।और इसके साथ ही वृक्ष पूजा का भी प्रबलता था। तथा कूबड़वाला सांड लोगों के लिए विशेष पूजनीय था। हड़प्पा सभ्यता से जुड़ी अनसुनी बातें जो आप अभी तक नहीं जानते नाग की भी पूजा लोग करते थे। इस सभ्यता में मन्दिर के अवशेष नहीं मिले हैं।

आर्थिक जीवन –

कृषि, पशुपालन, शिल्प और व्यापार आर्थिक जीवन आधार पर थे। हड़प्पा सभ्यता से गेहूँ, जौ, कपास, खजूर, तरबूज, मटर, राई, सरसों एवं तिल सहित कुल नौ फसलों की जानकारी मिली है। और दुनिया में प्रथम कपास की खेती यहाँ से शुरुआत हुई, इसीलिए यूनानियों ने इसे सिण्डाॅन कहा है। कुत्ता, बैल, बकरी, भेड़ आदि पालतू पशु थे।

क्या हड़प्पा की लिपियाँ पढ़ी जा सकती हैं?

जैसा की दोस्तों हड़प्पा सभ्यता की भाषा और लिपि को पढ़ना बहुत कठिन है

धार्मिक विश्वास:
  • मंदिर या महल जैसी कोई संरचना नहीं मिली है।
  • लोग नर और मादा देवताओं की पूजा करते थे।
  • खुदाई में एक ऐसी मुहर प्राप्त हुई जिसे ‘पशुपति सील (Pashupati Seal) नाम दिया गया था और यह तीन आँखों वाली आकृति की छवि जैसी दिखती है।
भौगोलिक विस्तार:

भौगोलिक रूप से यह सभ्यता पंजाब, सिंध, बलूचिस्तान, राजस्थान, गुजरात और पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक फैली थी। इनमें सुत्काग्गोर (बलूचिस्तान में) से पूर्व में आलमगीरपुर (पश्चिमी यूपी) तक तथा उत्तर में मांडू (जम्मू) से दक्षिण में दायमाबाद (अहमदनगर, महाराष्ट्र) तक के क्षेत्र शामिल थे। कुछ सिंधु घाटी स्थल अफगानिस्तान में भी पाए गए हैं।

कालीबंगा (राजस्थान), लोथल, धोलावीरा, रंगपुर, सुरकोटडा (गुजरात), बनवाली (हरियाणा), रोपड़ (पंजाब)। पाकिस्तान में: हड़प्पा (रावी घाटी के तट पर), मोहनजोदड़ो (सिंध में सिंधु घाटी के तट पर), चन्हुदड़ो (सिंध में)। सिंधु घाटी के शहर इतने परिष्कृत और उन्नति का स्तर प्रदर्शित करते हैं जो अन्य समकालीन सभ्यताओं में नहीं देखा गया। अधिकतर शहर समान पैटर्न पर बने थे।

गढ़ और निचला शहर

जोकि समाज में पदानुक्रम की उपस्थिति को दर्शाता है। अधिकतर शहरों में एक बड़ा स्नानागार था। हड़प्पा सभ्यता से जुड़ी अनसुनी बातें जो आप अभी तक नहीं जानते अन्न भंडार, पकी हुई ईंटों से बने दो मंजिला घर, बंद जल निकासी लाइनें और अपशिष्ट जल प्रबंध की बेहतर प्रणाली के साथ ही यहाँ खिलौने, बर्तन आदि भी मिले। यहाँ बड़ी संख्या में मुहरें पाई गई है।

कृषि:
  • फसलें गेहूँ, जौ, कपास, रागी, खजूर और मटर थीं।
  • सुमेरियों (मेसोपोटामिया) के साथ व्यापार किया जाता था।
  • कपास की खेती करने वाली पहली सभ्यता।
  • पशुपालन के तहत भेड़, बकरी और सूअर को भी पाला जाता था
धातु उत्पाद:

तांबा, कांस्य, टिन और सीसा शामिल थे। सोना-चाँदी भी ज्ञात थे। लोहे का ज्ञान उन्हें नहीं था।

मिट्टी के बर्तन:

खुदाई में काले रंग में डिज़ाइन किये गए लाल मिट्टी के श्रेष्ठता बर्तनों के टुकड़े पाए गए हैं। फेएन्स  का इस्तेमाल मोतियों, चूड़ियों, झुमके और बर्तन बनाने के लिये किया जाता था।

आर्ट फार्म:

मोहनजोदड़ो से ‘डांसिंग गर्ल (Dancing Girl) की एक मूर्ति मिली है और माना जाता है कि यह 4000 वर्ष पुरानी है। मोहनजोदड़ो से एक दाढ़ी वाले पुजारी-राजा की आकृति भी मिली है

सिंधु घाटी सभ्यता की लिपि को सर्वप्रथम किसने पढ़ा

सैंधवी लिपि को पढ़ने की कोशिश करने वाले डॉक्टर जॉन मार्शल सहित आधे दर्जन से अधिक भाषा और पुरातत्वविदों के हवाले से मोतीरावण कंगाली कहते हैं, “सिन्धु घाटी सभ्यता की भाषा द्रविड़ पूर्व (प्रोटो द्रविड़ीयन) भाषा थी.”

सिंधु घाटी सभ्यता में व्यापार

सबसे ज्यादा जरुरी बात यह है कि मोहनजोदड़ो में आखिरी समय को छोड़कर नगर के पास मृदभांड बनाने के भट्ठे नहीं मिलते. और बर्तन निर्मित करने वाले कुम्हारों का एक अलग वर्ग रहा होगा.आखिरी समय में तो इनका नगर में ही एक अलग मोहल्ला रहा होगा, ऐसा विदयानो को यह मानना हैं. की यहाँ के कुम्हारों ने विशेष आकार-प्रकार के बर्तनों का ही रचना किया, हड़प्पा सभ्यता से जुड़ी अनसुनी बातें जो आप अभी तक नहीं जानते जो अन्य सभ्यता के बर्तनों से अलग पहचान रखा करते थे। पत्थर, धातु और मिट्टी की मूर्तियों का निर्माण भी जरुरी श्रम रहे होंगे. मनके बनाने वालों की दुकानों और कारखानों के विषय में चन्हुदड़ो और लोथल के खुदाईों से जानकारी मिली है. मुद्राओं को निर्मित करने वालों का एक भिन्न वर्ग रहा होगा.कुछ लोग हाथीदांत से अलग -अलग चीजों के निर्माण का काम किया करते थे. और गुजरात क्षेत्र में उस काल में काफी संख्या में हाथी रहे होंगे और इसलिए इस क्षेत्र में हाथी दांत सहज रहा होगा.

हाथीदांत की वस्तुओं के रचना और व्यापार में लोथल का जरुरी हाथ रहा होगा. सिन्धु सभ्यता घाटी से बेशक़ीमत पत्थरों के मनके और हाथीदांत की वस्तुएँ पश्चिमी एशिया में निर्यात किया जाता था। व्यापारियों का पूरा वर्ग रहा होगा. पुरोहितों, वैद्यों, ज्योतिषियों के भी वर्ग रहे होंगे और संयोग से उनका समाज में जरुरी स्थान रहा होगा. हड़प्पा सभ्यता से जुड़ी अनसुनी बातें जो आप अभी तक नहीं जानते हड़प्पाई मनके सिन्धु घाटी सभ्यता में मृदभांड-निर्माण और मुद्रा-निर्माण के समान ही मनकों का निर्माण भी एक विकासशील श्रम था. मनकों के निर्माण में सेलकड़ी, गोमेद, कार्नीलियन, जैस्पर आदि पत्थरों, सोना, चाँदी और ताम्बे जैसे धातुओं का इस्तेमाल हुआ. कांचली मिट्टी, मिट्टी, शंख, हाथीदांत आदि के भी मनके बने.

मनकों के प्रकार

बेलनाकार
दंतचक्र
छोटे ढोलाकार
लम्बे ढोलाकार
अंडाकार या अर्धवृत्त काट वाले आयत आकृतिवाला
खाड़ेदार तिर्यक (fiuted tapered)
लम्बे ढोलाकार (long barrel cylinder)
बिम्ब (disc)
गोल
रेखांकित
दांत की शक्ल
सीढ़ीनुमा







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