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ईद का इतिहास | Why is Eid celebrated in 2022?

ईद का इतिहास

ईद का इतिहास हेलो दोस्तों स्वागत है आपका हमारी वेबसाइट पर आज हम आपको महत्वपूर्ण जानकारी देने वाले है आज का जो विषय है वो है आख़िरकार ईद क्यों मनाई जाती है और ईद का इतिहास क्या है । इस त्यौहार का क्या इतिहास है आज हम पूर्ण जानकारी आज हम आपको देने वाले है तो दोस्तों आप लोग इस आर्टिकल को अंत तक जरूर पढ़े।

पुरे विश्व में निवास करने वाले तक़रीबन 2 अरब मुसलमान रमजान महीने के आखिर शाम को चांद देखते हैं अगर ईद का चांद दिख जाता हैं तब ही अगले दिन ईद का त्यौहार मनाने की परंपरा करीब 1400 सालो से चली आ रही है  ईद का इतिहास इस्लामिक कलेंडर या हिजरी कैलेंडर में रमजान नवां महिना का नाम हैं और इसी महीने में मुसलमान लोग रोजा रखते हैं और रमजान के आखिरी दिन यानी आखिरी रोजा चांद को देखकर रोजा खत्म किया जाता है ईद का इतिहास और दसवां महिना के पहले दिन ईद उल फ़ित्र पर्व मनाया जाता हैं। history of eid 

ईद का इतिहास

जब पैगंबर हजरत मोहम्मद साहब बद्र के युद्ध में सफलता मिली और इसी जीत की खुशी में  यह ईद उल फितर पर्व मनाया जाता है। ईद का इतिहास इतिहासकार मानते हैं की 624 ईसवी में पहला ईद उल फितर पर्व मनाया गया होगा। ईद पर्व भाईचारा को बढ़ावा देने वाला त्यौहार है इस दिन सभी लोग आपस में गले मिलकर एक दूसरे की शांति ,सुख और बरकत के लिए दुआएं करते हैं।

हामिद और उसकी दादी अमीना की कहानी –

रमजान के पूरे 30 दिन के बाद ईद पर्व के दिन छोटा बच्चा हामिद लगभग 3 कोस पैदल चलकर खुशी-खुशी ईदगाह जाता है वह नमाज के बाद जब सारे बच्चे मिठाइयां खाते देखता हैं तो उसे भी मिठाई खाने की इच्छा होती हैं  मिठाई दुकान पर जाता हैं ईद का इतिहास तबी अचानक उसे अपने दादी अमीना की तकलीफ याद आती है और वह मिठाई ना खाकर अपनी बूढी दादी के लिए चिमटा खरीदा लाता  है ताकि रोटी बनाते वक़्त उसकी दादी के हाथ ना जले | मुंशी प्रेमचंद ने अपनी इस कहानी से ना केवल ईद के  महत्व को उजागर किया है बल्कि नन्हे से बच्चे हामिद के जरिए प्यार और सद्भाव का अनोखा संदेश भी दिया है जो की हर बार ईद के इस मुबारक दिन पर एक अनूठी छाप छोड़ जाता है | history of eid 

ईद की शुरूआत –

ईद की शुरूआत मदीना नगर से हुई थी। ईद का इतिहास जब पैगंबर मोहम्मद मक्का से मदीना आए थे। मोहम्मद साहब ने कुरान में दो पवित्र दिनों को ईद के लिए निर्धारित किया था। इसी वजह से साल में दो बार ईद मनाने की परंपरा है। एक है ईद-उल-फितर (मीठी ईद) और दूसरा है ईद-उल-अज़हा (बकरीद)।

इस्लामिक मान्यता के अनुसार ईद उल फितर की शुरूआत जंग-ए-बद्र के बाद हुई थी। जिसमें पैगंबर मुहम्मद साहब की अगुवाई में मुसलमानों को जीत हासिल हुई थी। जीत की खुशी में लोगों ने ईद मनाई थी। ईद उल-फितर का त्योहार अमीर से लेकर गरीब हर कोई खुशी से मना सके इसके लिए इस्लाम में ग़रीबों को फितरा भी दिया जाता है। होली की ही तरह ईद के दिन भी लोग एक दूसरे से गले मिलकर आपसी प्यार को बढ़ाते हैं। history of eid 

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सद्भाव और मदद का पैगाम देता है ये त्योहार

ईद का त्योहार सबको साथ लेकर चलने का संदेश देता है। ईद पर हर मुसलमान चाहे वो आर्थिक रुप से संपन्न हो या न हो, सभी एक साथ नमाज पढ़ते हैं और एक दूसरे को गले लगाते हैं। इस्लाम में चैरिटी ईद का एक महत्वपूर्ण पहलू है। ईद का इतिहास हर मुसलमान को धन, भोजन और कपड़े के रूप में कुछ न कुछ दान करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। कुरान में ज़कात अल-फ़ित्र को अनिवार्य बताया गया है। जकात यानी दान को हर मुसलमान का फर्ज कहा गया है। ये गरीबों को दिए जाने वाला दान है। परंपरागत रूप से इसे रमजान के अंत में और लोगों को ईद की नमाज पर जाने से पहले दिया जाता है। मुस्लिम अपनी संपत्ति को पवित्र करने के रूप में अपनी सालाना बचत का एक हिस्सा गरीब या जरूरतमंदों को कर के रूप में देते हैं। विश्व के कुछ मुस्लिम देशों में ज़कात स्वैच्छिक है, वहीं अन्य देशों में यह अनिवार्य है।

ईद का महत्व –

ईद-उल-फितर के दिन लोग खुदा का शुक्रिया अदा करते हैं। सुबह लोग नमाज अदा करते हैं और फिर शुरू होता है ईद का त्योहार। लोग नए-नए कपड़े पहनते हैं, एक दूसरे से गले मिलते हैं, बधाईयों के साथ उपहारों का भी आदान-प्रदान होता है। ईद का इतिहास घरों में तरह-तरह के पकवान बनाए जाते हैं खासतौर से मीठी सेवईंयां। जो ईद-उल-फितर की ट्रेडिशनल डिश है। हर घर में आपको इसका स्वाद चखने को मिल जाएगा। इस दिन एक और खास ट्रेडिशन जो लोग फॉलो करते हैं वो है जकात यानी दान। जिसमें अपनी कमाई का एक हिस्सा दान किया जाता है। अपनी क्षमता के हिसाब से लोग दान करते हैं जिससे इस त्यौहार की महत्वता और बढ़ जाती है।

क्यों मनाई जाती है ईद

मक्का से मोहम्मद पैगंबर के प्रवास के बाद पवित्र शहर मदीना में ईद-उल-फितर का उत्सव शुरू हुआ। माना जाता है कि पैगम्बर हजरत मुहम्मद ने बद्र की लड़ाई में जीत हासिल की थी। इस जीत की खुशी में सबका मुंह मीठा करवाया गया था, इसी दिन को मीठी ईद या ईद-उल-फितर के रुप में मनाया जाता है। ईद का इतिहास काज़ी डॉ सैय्यद उरूज अहमद ने बताया, इस्लामिक कैलेंडर के अनुसार हिजरी संवत 2 यानी 624 ईस्वी में पहली बार (करीब 1400 साल पहले) ईद-उल-फितर मनाया गया था। पैगम्बर हजरत मुहम्मद ने बताया है कि उत्सव मनाने के लिए अल्लाह ने कुरान में पहले से ही 2 सबसे पवित्र दिन बताए हैं। जिन्हें ईद-उल-फितर और ईद-उल-जुहा कहा गया है। इस प्रकार ईद मनाने की परंपरा अस्तित्व में आई। history of eid 

ईद की नमाज़-

बिस्मिल्लाह हिर्रहमा निर्रहीम

सबसे पहले हम ये जान लें की ईद eid ul fitr की नमाज़ में न तो अज़ान होती है और ना ही इक़ामत पढ़ी जाती है|

लेकिन ईद के नमाज़ में 6 तकबीरें ज्यादा होती है 3 तकबीर पहली रकअत के दरमियान सना पढ़ने के बाद होता है और 3 तकबीर दूसरी रकअत में रुके में जाने से पहले होता है |

  • वित्र की नमाज़ का मुकम्मल तरीका
  • ईशा की नमाज़ का मुकम्मल तरीका
  • और ईद के नमाज़ में खुत्बा नमाज़ के बाद पढ़ा जाता है

अब हम ईद की नमाज़ का तरीका को निचे स्टेप by स्टेप बता रहे है

ईदुल फ़ित्र की नमाज़ की नियत हिंदी में (eid ul fitr)

  1. पहली रकात
  • नियत करती हूँ मैं दो रकात नमाज़ वाजिब मै 6 तकबीरों के वास्ते अल्लाह तआला के रुख मेरा काबा शरीफ़ के तरफ़ अल्लाहु अकबर कहते हुए अपने दोनों हांथो को बाँध लें |
  • इसके बाद आप सना पढ़ें :- सुब हानकल लाहुम्मा व बिहम्दिका व तबा रकस्मुका व तआला जददुका वला इलाहा गैरुक
  • सना पढने के बाद तीन मर्तबा तक्बीरें कहनी है:- अल्लाहु अकबर अल्लाहु अकबर अल्लाहु अकबर
  • दो मर्तबा अल्लाहु अकबर कह कर कानों तक अपने दोनों हांथो को उठायें और फिर छोड़ दें|
  • तीसरी मर्तबा में अल्लाहु अकबर कह कर कानों तक अपने दोनों हांथो को उठायें और फिर नाभ के निचे बाँध लें |
  • उसके बाद फिर Alhamdu Sharif यानि के surah Fatiha पढ़ें  और फिर कोई दूसरा सूरह पढ़ कर रुकू में जाएँ और सजदा करें और फिर इसी तरह ये रकात आम नमाज़ों की तरह  ही मुकम्मल करें |
  1. दूसरी रकात

अब जब दूसरी रकात के लिए जब आप खड़े होंगे तो Alhamdu Sharif और फिर कोई दूसरा सूरह पढ़ने के बाद फिर चार तक्बीरें कहनी हैं |

तीन तकबीरों :- में अपने हांथो को उठा कर छोड़ देना है और फिर चौथी तकबीर में बगैर हाथ उठाये रुकू में चले जाना है, इसके बाद फिर आप आम नमाज़ों की तरह इस नमाज़ को मुक़म्मल करना है, उसके बाद आपको दुआ मांगना है | history of eid 

दोस्तों उम्मीद है आज हमने आपको ईद किसलिए मनाई जाती है।  पूर्ण जानकारी आज हमने दी यकीन है आपको यह जानकारी जरूर पसंद आयी होगी।  और आपको यह जानकारी पसंद आयी है तो आप हमें कमेंट बॉक्स जरूर बताये ।

धन्यवाद


 

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