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महर्षि वाल्मीकि का जीवन परिचय, जयंती 2022, निबंध Maharshi Valmiki Biography in Hindi

महर्षि वाल्मीकि का जीवन परिचय, जयंती 2022, बचपन, जन्म,प्रारंभिक जीवन,श्लोक,घटनाए, भूमिका

Maharshi Valmiki Jayanti Date Introduction Prakat Divas Mahatva Essay In Hindi हेलो दोस्तों स्वागत है आपका आपकी website पर आज हम आपको बताने वाले है की Maharshi Valmiki Jayanti Date Introduction Prakat Divas Mahatva Essay In Hindi दोस्तों काफी लोगो को इसके बारे में जानना होता है पर नहीं पता होता इसलिए यह post only आपके लिए लेकर आये है और आपको All Information आपको आपकी website jugadme से मिल जाएगी आपको किसी और website पर जाने की जरुरत नहीं पड़ेगी। तो आज हम आपसे इस post में बात करेंगे। वाल्मीकि जी first कवि, रामायण के रचयिता और आदि कवि के रूप में Prestigious हैं। जिसमें 24,000 श्लोक हैं। उन्हें योग वशिष्ठ का लेखक भी माना जाता है। एक पाठ जो कई दार्शनिक मुद्दों पर विस्तृत करता है। वाल्मीकि की समय अवधि और जीवन के संबंध में विभिन्न संस्करण हैं। माना जाता है कि वाल्मीकि रामायण 500 ईसा पूर्व से 100 ईसा पूर्व की अवधि के विभिन्न प्रकार के हैं। लेकिन साथ ही वाल्मीकि को भगवान राम का समकालीन भी कहा जाता है। महर्षि वाल्मीकि के जीवन को लेकर बहुत विवाद है। एक पुरानी मान्यता है कि ऋषि वाल्मीकि बनने से पहले Ratnakkardah नामक एक राजमार्ग डाकू था। इस व्यापक रूप से स्वीकृत कहानी को नीचे विस्तार से समझाया गया है। लेकिन पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति राजीव भल्ला द्वारा वर्ष 2010 में दिया गया एक निर्णय महर्षि वाल्मीकि के बारे में सदियों पुरानी धारणा को बदल सकता है। जस्टिस भल्ला ने panjabi university ,पटियाला के महर्षि वाल्मीकि Chair के प्रमुख मंजुला सहदेव द्वारा किए गए शोध का हवाला देते हुए कहा कि वास्तविक तथ्य पुरातनता की धुंध में खो गए प्रतीत होते हैं। Maharshi Valmiki Jayanti Date Introduction Prakat Divas Mahatva Essay In Hindi judge ने शोध की Main characteristics को बताते हुए कहा कि “वैदिक Literature से 9वीं शताब्दी AD तक, ऐसा कोई संदर्भ नहीं है कि महर्षि वाल्मीकि ने एक डाकू या राजमार्ग के जीवन का नेतृत्व किया।





 

वाल्मीकिजी का बचपन

पौराणिक कथा के अनुसार महर्षि वाल्मीकि का मूल नाम Ratnakkardah था. उनके पिता ब्रह्माजी के मानस पुत्र प्रचेता थे. बचपन में एक भीलनी ने Ratnakkardah का abduction कर लिया और इनका लालन-पालन भील Famly के साथ ही हुआ. भील अपनी गुजर-बसर के लिए जंगल के रास्ते से गुजरने वाले लोगों को लूटा करते थे. Ratnakkardah भी भील Famly के साथ डकैती और लूटपाट का काम करने लगे थे.

इस घटना ने बना दिया डाकू से साधु

एक बार नारद मुनि जंगल से गुजर रहे थे. तभी डाकू Ratnakkardah ने उन्हें लूटने का प्रयास किया और बंदी बना लिया. इस पर नारद जी ने उनसे पूछा कि तुम ये अपराध क्यों करते हो? तो Ratnakkardah ने कहा कि अपने Famly के भरण-पोषण के लिए मैं ऐसा करता हूं. इस पर नारद मुनि ने कहा, कि जिस Famly के लिए तुम यह अपराध करते हो, क्या वे तुम्हारे पापों का भागीदार बनने को तैयार है ? नारद जी की ये बात सुनकर Ratnakkardah ने नारद मुनि को एक पेड़ से बांधा और इस question का उत्तर लेने के लिए अपने घर गए.उन्होंने जब ये सवाल अपने Famly के लोगों से किया तो उनको यह जानकर आश्चर्य हुआ कि कोई भी उनके इस पाप में भागीदार नहीं बनना चाहता था. उन्होंने वापस आकर नारद जी को स्वतंत्र कर दिया और अपने पापों के लिए क्षमा प्रार्थना की. इस पर नारद जी ने उनको राम नाम का जप करने का उपदेश दिया. लेकिन Ratnakkardah के मुंह से राम-राम की जगह ‘मरा-मरा’ शब्द निकल रहा था. तब नारद मुनि ने कहा तुम मरा-मरा ही बोलो इसी से तुम्हें राम मिल जायेंगे. इसी शब्द का जाप करते हुए Ratnakkardah तपस्या में लीन हो गए. तपस्या में लीन हुए Ratnakkardah के शरीर पर कब दीमकों ने बांबी बना ली इसका पता उन्हें नहीं चला. उनकी इस तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्माजी ने उन्हें दर्शन दिए और उनके शरीर पर बनी बांबी को देखकर Ratnakkardah को वाल्मीकि का नाम दिया. तब से उन्हें वाल्मीकि के नाम से जाना जाता है. साथ ही ब्रह्माजी ने उनको रामायण की रचना करने की प्रेरणा भी दी.

sanskrit का पहला श्लोक

महर्षि वाल्मीकि एक बार एक क्रौंच पक्षी के जोड़े को निहार रहे थे जो कि प्रेम करने में लीन था. उन पक्षियों को देखकर महर्षि काफी प्रसन्न हो रहे थे और मन ही मन सृष्टि की इस अनुपम कृति की प्रशंसा भी कर रहे थे. लेकिन तभी एक huntsman का तीर उस पक्षी जोड़े में से एक पक्षी को आ लगा, जिससे उसकी मौत हो गयी. यह देख के महर्षि को बहुत क्रोध आया और उन्होंने huntsman को sanskrit में ये श्लोक कहा.

“मां निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः।

यत्क्रौंचमिथुनादेकम् अवधीः काममोहितम्॥”

प्रसंग

आपने मुझे प्राप्त किया है, निषाद, शाश्वत समानता की स्थापना।

कि तुमने वासना से मोहित क्रौंचों के जोड़े में से एक को मार डाला।”

मुनि द्वारा बोला गया यह श्लोक ही sanskrit language का पहला श्लोक माना जाता है. जिसका meaning था कि जिस दुष्ट huntsman ने प्रेम में लिप्त पक्षी का वध किया है उसे कभी चैन नहीं मिलेगा. लेकिन ये श्लोक बोलने के बाद वाल्मीकि सोचने लगे कि आखिर ये उनके मुंह से कैसे और क्या निकल गया. उनको सोच में देखकर नारद मुनि उनके सामने प्रकट हुए और कहा कि यही आपका पहला sanskrit श्लोक है. अब इसके बाद आप रामायण की रचना करेंगे. उस sanskrit श्लोक के बाद महर्षि वाल्मीकि ने ही sanskrit में रामायण की रचना की और उनके द्वारा रची गयी रामायण वाल्मीकि रामायण कहलाई.

प्रारंभिक जीवन

महर्षि वाल्मीकि का जन्म ऋषि प्रचेतस के यहाँ Ratnakkardah के रूप में हुआ था। बहुत कम उम्र में Ratnakkardah जंगल में चले गए और खो गए। पास से गुजर रहे एक huntsman ने Ratnakkardah को देखा और उसे अपनी देखरेख में ले लिया। अपने पालक माता-पिता के प्यार और देखभाल के तहत, Ratnakkardah अपने मूल parents को भूल गए। अपने पिता के मार्गदर्शन में Ratnakkardah एक उत्कृष्ट huntsman निकला। जैसे ही वह विवाह योग्य उम्र के करीब पहुंचा, Ratnakkardah का विवाह huntsman Famly की एक सुंदर लड़की से हो गया।

जैसे-जैसे उनका Famly बड़ा होता गया, Ratnakkardah ने उन्हें खिलाना असंभव के बगल में पाया। नतीजा यह हुआ कि उसने लूटपाट की और एक गांव से दूसरे गांव जाने वाले लोगों को लूटना शुरू कर दिया। एक दिन, महान ऋषि नारद, जंगल से गुजरते हुए, Ratnakkardah द्वारा हमला किया गया था। जैसे ही नारद ने अपनी वीणा बजायी और भगवान की स्तुति गाई, उन्होंने देखा कि Ratnakkardah के ऊपर एक Change आ रहा है। फिर, उसने Ratnakkardah से पूछा कि क्या वह Famly , जिसके लिए वह दूसरों को लूट रहा था, उसके पापों में भी भाग लेगा। Ratnakkardah अपने Famly से वही question पूछने गए और उनके Famly के सभी members द्वारा मना किए जाने पर, वे ऋषि नारद के पास वापस गए। नारद ने उन्हें ‘राम’ का पवित्र नाम सिखाया और नारद के वापस आने तक, राम के नाम का जाप करते हुए उन्हें ध्यान में बैठने के लिए कहा।

Ratnakkardah ने निर्देशों का पालन किया और वर्षों तक ध्यान मुद्रा में बैठे रहे। इस दौरान उनका शरीर पूरी तरह से एंथिल से ढक गया। अंत में, नारद उनसे मिलने आए और उनके शरीर से सभी एंथिल हटा दिए। फिर, उन्होंने Ratnakkardah से कहा कि उनकी तपस्या (ध्यान) का भुगतान किया गया और भगवान उनसे प्रसन्न हुए। Ratnakkardah को एक ब्रह्मर्षि का सम्मान दिया गया था और वाल्मीकि का नाम दिया गया था। क्योंकि उनका जन्म वाल्मीक (एंटी-हिल) से हुआ था। ऋषि वाल्मीकि ने गंगा नदी के तट पर अपना आश्रम Established किया। भगवान राम को प्राप्त करना एक दिन, वाल्मीकि को अपने आश्रम में भगवान राम, उनकी पत्नी सीता और भाई लक्ष्मण को प्राप्त करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। वाल्मीकि के सुझाव पर, भगवान राम ने आश्रम के पास चित्रकूट पहाड़ी पर अपनी झोपड़ी का निर्माण किया। रामायण लिखना नारद एक बार अपने आश्रम में महर्षि वाल्मीकि के पास गए और उन्होंने भगवान राम की कहानी सुनाई। तत्पश्चात उन्हें ब्रह्मा से एक दर्शन प्राप्त हुआ जिसमें भगवान ने उन्हें श्लोकों में रामायण लिखने का निर्देश दिया। जिसका ऋषि ने तत्परता से पालन किया।

महर्षि वाल्मीकि का जन्म

हम सभी लोगों को बता देना चाहते हैं कि महर्षि वाल्मीकि जी बहुत ही पुराने समय में थे। अतः महर्षि वाल्मीकि जी के जन्म के विषय में जानकारी बताना किसी भी व्यक्ति के बस की बात नहीं थी। यही कारण है कि अब तक महर्षि वाल्मीकि जी के जन्म के विषय में कोई विशेष जानकारी उपलब्ध नहीं है। हालांकि कुछ ग्रंथों के माध्यम से यह पता चला है कि महर्षि वाल्मीकि जी का जन्म अश्विन मास की पूर्णिमा को हुआ था।

रामायण में भूमिका

वाल्मीकि ने महाकाव्य रामायण के अंतिम अध्याय उत्तरकांड में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उत्तरकांड मूल रूप से वाल्मीकि द्वारा काम नहीं किया गया हो सकता है। example के लिए, विद्वानों Robert और Sally Goldman ने बताया है। अधिकांश कथा राम के अलावा अन्य आंकड़ों पर केंद्रित है और केवल अप्रत्यक्ष रूप से वाल्मीकि द्वारा सुनाई गई है। जिसे अगस्त्य जैसे अन्य आंकड़ों के मुंह में रखा गया है। ऐसा माना जाता है कि इसे शेष रामायण से लिया गया है। पौराणिक कथा के अनुसार – राम ने सीता को वन भेजा। सीता ने ऋषि वाल्मीकि के आश्रम में शरण ली, जहाँ उन्होंने जुड़वां लड़कों लव और कुश को जन्म दिया. लव और कुश वाल्मीकि के पहले शिष्य थे। जिन्हें उन्होंने रामायण की शिक्षा दी थी। महाकाव्य के बाला कांड में वाल्मीकि की कहानी भी है जो लव और कुश को रामायण सुनाते हैं। जो उनके शिष्य बन जाते हैं।

महर्षि वाल्मीकि के जीवन से जुड़ी प्रेरणादायक घटनाएं

महर्षि वाल्मीकि जी का पालन पोषण भील नामक जाति में हुआ था। ऐसा कहा जाता है कि महर्षि वाल्मीकि जी का पालन पोषण भले ही भील नामक जाति में हुआ था, परंतु महर्षि वाल्मीकि भील जाति से संबंध नहीं रखते थे। वास्तव में वाल्मीकि जी के पिता प्रचेता थे। महर्षि वाल्मीकि जी के बचपन का नाम Ratnakkardah था और इनका पालन-पोषण जंगल में ही हुआ था।महर्षि वाल्मीकि के पिता प्रचेता ब्रह्मा जी के पुत्र थे, ऐसा पुराणों में व्याख्यान देखने को मिलता है। महर्षि वाल्मीकि जी के जन्म के बाद से उन्हें बचपन में ही एक भीलनी के द्वारा चुरा लिया गया था, जिसके कारण इनका पालन-पोषण भील समाज में ही हुआ और यही कारण है, कि महर्षि वाल्मीकि अपनी वास्तविकता पहचानने से पहले एक डाकू हुआ करते थे।महर्षि वाल्मीकि जी ने अपने Famly का पालन पोषण करने के लिए राहगीरों को अर्थात जंगल के रास्ते से आने जाने वाले लोगों को लूटते थे और यदि उनसे हाथापाई हो जाए तो यह उन्हें मार ही देते थे। महर्षि वाल्मीकि प्रतिदिन अपने इसी घटना को दोहराते हुए हैं और राहगीरों को लूटते थे। ऐसा करके उन्होंने अपने पाप का घड़ा लगभग भर ही लिया था। 1 दिन उसी जंगल से देवताओं के मुनि नारद गुजर रहे थे। तभी वहां पर Ratnakkardah ने उन्हें देख लिया और तुरंत बंदी बना लिया। Ratnakkardah ने जब नारद मुनि को बंदी बना लिया तब नारद मुनि ने Ratnakkardah से पूछा कि यह पाप क्यों कर रहे हो Ratnakkardah की आवाज सुनने के बाद नारद मुनि ने पुनः पूछा कि क्या जिस Famly के लिए तुम यह सभी पाप किए जा रहे हो, वह Famly तुम्हारे पापों के फल को ही वहन करेगा? Ratnakkardah ने महर्षि वाल्मीकि का जवाब सुनते हैं, तुरंत पूरे जोश में आ गया और कहा हां क्यों नहीं करेगा, मेरा Famly मेरे पापों के फल को भी वहन करेगा। मेरा Famly सदा मेरे साथ रहता है।

देवताओं के ऋषि नारद मुनि ने पुनः Ratnakkardah से कहा कि तुम एक बार अपने Famly वालों से भी तो पूछ लो। यदि वे तुम्हारे पापों के फल को भी वहन करने के लिए कहते हैं तो मैं तुम्हें हंसते-हंसते मेरा सारा धन दे दूंगा। Ratnakkardah तुरंत वहां से गुस्से से निकल गया और उसने अपने सभी Famly वालों एवं मित्र जनों से यही सवाल पूछा। परंतु उसके किसी भी Famly वालों ने या फिर उनके मित्रों ने इस बात के लिए हामी नहीं भरी। अपने Famly वालों ने मित्रों की यह बात सुनकर Ratnakkardah को बहुत ही बड़ा दुख हुआ और वह वापस नारद मुनि के पास गए हैं। नारद मुनि ने पूछा कि क्या तुम्हारे किसी भी Famly वालों ने इसकी हामी भरी तो Ratnakkardah बोलता है नहीं। पुराणों के अनुसार महर्षि ब्रह्मा के आज्ञा अनुसार श्री हरि नारद मुनि ने उन्हें उनके ज्ञान को पहचानने को कहा। परंतु इन्हें कुछ भी याद नहीं आ रहा था, जिसके कारण नारद मुनि ने अपनी चतुराई से इन्हें मारने पीटने जैसे शब्द से ही भगवान श्री राम का नाम लेने का सुझाव दिया। नारद मुनि ने महर्षि वाल्मीकि को राम के नाम के स्थान पर मरा शब्द का उच्चारण बार-बार करने को कहा। नारद मुनि की आवाज सुनकर महर्षि वाल्मीकि ने घोर तपस्या करने की ठानी और मरा शब्द के उच्चारण से इन्होंने योग सिद्धि हासिल की। महर्षि नारद ने इन्हें मरा शब्द का उच्चारण इसलिए करने को कहा। क्योंकि मारा शब्द को बार बार कहने पर राम का नाम सामने आता है। यही कारण है कि महर्षि वाल्मीकि ने अपनी घोर तपस्या को सफल किया और योग सिद्धि हासिल की।

महाभारत में भूमिका

वाल्मीकि महाभारत के समय में मौजूद थे और वह युद्ध के बाद युधिष्ठिर से मिलने वाले कई संतों में से एक थे। उन्होंने युधिष्ठिर को शिव की आराधना के लाभ बताए। एक बार की बात है। कुछ तपस्वियों ने, जिनके पास यज्ञ की अग्नि थी।
वाल्मीकि को ब्राह्मणहत्या का दोषी करार दिया। शापित होते ही पाप उसके पास आ गया। इसलिए उन्होंने शिव से प्रार्थना की और वे अपने सभी पापों से मुक्त हो गए। बाद में उन्होंने युधिष्ठिर से कहा कि उन्हें भी उनकी तरह शिव से प्रार्थना करनी चाहिए।

विष्णुधर्मोत्तर पुराण में कहा गया है कि वाल्मीकि का जन्म त्रेता युग में ब्रह्मा के रूप में हुआ था जिन्होंने रामायण की रचना की थी और ज्ञान अर्जित करने के इच्छुक लोगों को वाल्मीकि की पूजा करनी चाहिए। बाद में उनका तुलसीदास के रूप में पुनर्जन्म हुआ। जिन्होंने रामचरितमानस की रचना की जो रामायण का अवधी – हिंदी संस्करण था। सीता के साथ राम उनकी गोद में उनके बच्चे लव और कुश। सिंहासन के पीछे लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न खड़े हैं। सिंहासन के सामने हनुमान राम को प्रणाम करते हैं। वाल्मीकि बाईं ओर। हिंदू धर्म का बाल्मीकि संप्रदाय वाल्मीकि का सम्मान करता है। जहां उन्हें लाल बेग या बाला शाह के नाम से भी जाना जाता है। एक संरक्षक संत के रूप में, उन्हें समर्पित मंदिरों (मंदिरों) के ढेर के साथ। माना जाता है कि चेन्नई में एक क्षेत्र , तिरुवन्मियूर का नाम ऋषि वाल्मीकि, थिरु-वाल्मीकि-ऊर से लिया गया है। इस स्थान पर वाल्मीकि का मंदिर है। जो 1300 वर्ष पुराना माना जाता है। कर्नाटक के राजनहल्ली में श्री वाल्मीकि माता महा संस्थान भी है ।

महर्षि Valmiki Jayanti और क्या है इसका महत्व?
कब मनाया जाता है

जैसा कि हमने आपको ऊपर बताया महर्षि वाल्मीकि जी का जन्म आश्विन मास के पूर्णिमा को हुआ था और महर्षि वाल्मीकि जी ने ही इस world को sanskrit language का बोध कर आया। क्योंकि इन्होंने ही सर्वfirst sanskrit language में श्लोक लिखा था और महर्षि वाल्मीकि के जन्म तिथि को ही हिंदी धर्म के कैलेंडर के अनुसार Valmiki Jayanti कहा जाता है। इसे प्रत्येक वर्ष के 31 अक्टूबर को मनाया जाता है।

FAQ (महर्षि वाल्मीकि जी से जुड़े प्रश्न )

Q : महर्षि वाल्मीकि कौन थे?
प्रसिद्ध महाकाव्य रामायण के रचयिता थे।

Q : महर्षि वाल्मीकि जी का असली नाम क्या था?
डाकू Ratnakkardah।

Q : महर्षि वाल्मीकि जी के पिता का क्या नाम था?
प्रचेता जो कि ब्रह्मा के पुत्र थे।

Q : महर्षि Valmiki Jayanti कब मनाई जाती है?
प्रत्येक वर्ष 31 अक्टूबर को महर्षि Valmiki Jayanti मनाई जाती है।

Q : महर्षि वाल्मीकि जी का जन्म किस देश में हुआ था?
महर्षि वाल्मीकि जी का जन्म भारत में हुआ था।

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