Thursday, June 13, 2024
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वत पूर्णिमा वट सावित्री व्रत 2023 का महत्त्व,शुभ मुहूर्त पूजा विधि

वत पूर्णिमा व वट सावित्री व्रत 2023 का महत्त्व,शुभ मुहूर्त, कथा, पूजा विधि ( Vat Purnima or Vat Savitri 2023 Vrat, katha, Shubh Muhurth, puja vidhi, importance in hindi)

वत पूर्णिमा वट सावित्री व्रत 2023- वत पूर्णिमा वट सावित्री व्रत 2023 का महत्त्व,शुभ मुहूर्त पूजा विधि- वत पूर्णिमा हिंदी कैलेंडर के अनुसार हिन्दू पंचांग में माघ मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को कहते हैं। यह हिन्दू धर्म में महत्वपूर्ण त्योहारों में से एक है। यह त्योहार विशेष रूप से नाग देवता (सर्प देवता) की पूजा के लिए मान्यता प्राप्त है।





वत पूर्णिमा को नाग पूजा के रूप में भी जाना जाता है, जिसमें विशेष रूप से सर्प देवता की पूजा की जाती है। इस दिन लोग नाग मंदिरों में जाकर सर्प देवता की पूजा करते हैं और नाग नगिना के मूर्तियों को दूध, दिव्य जल, फल और नागदल के साथ चढ़ावा करते हैं। यह धार्मिक रीति आदिकाल से चली आ रही है और लोग नाग देवता की कृपा और आशीर्वाद के लिए नाग पूजा करते हैं।

इसके अलावा, वत पूर्णिमा को भारतीय संस्कृति में विवाहित महिलाओं के लिए भी महत्वपूर्ण दिन माना जाता है। यह दिन महिलाएं व्रत रखती हैं और अपने पति की लंबी उम्र और सुख-शांति की कामना करती हैं। इस व्रत को उद्यापन करने के बाद महिलाएं भगवान विष्णु की पूजा करती हैं और अपने पति को व्रत कथा सुनाती हैं। वत पूर्णिमा धार्मिक, सांस्कृतिक और पारिवारिक महत्व रखती है और इसे धैर्य, शक्ति, स्नेह, सम्मान और सुख-शांति की प्रतीक माना जाता है।

वट सावित्री व्रत क्या है (Vat Savitri Vrat)

वत पूर्णिमा वट सावित्री व्रत 2023- वट सावित्री व्रत भारतीय हिन्दू महिलाओं द्वारा मनाया जाने वाला एक प्रमुख व्रत है। यह व्रत स्त्री शक्ति और पति की लंबी उम्र की कामना करती है। यह व्रत सावित्री देवी की कथा और महिलाओं के पतियों की लंबी उम्र और सुख-शांति के लिए व्रत रखने की परंपरा पर आधारित है।

यह व्रत वैशाख मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है, जो हिन्दी कैलेंडर के अनुसार मई-जून में पड़ती है। सावित्री देवी की कथा के अनुसार, सावित्री महिलाएं व्रत रखती हैं और पति की लंबी उम्र की कामना करती हैं।

वत पूर्णिमा वट सावित्री व्रत 2023 का महत्त्व- व्रत के दिन महिलाएं सुबह जल्दी उठकर स्नान करती हैं और व्रत की संबंधित सामग्री जैसे कि सावित्री व्रत की कथा, व्रत कथा पुस्तक, फल, फूल, दिव्य जल, चावल, सिन्दूर, मीठाई आदि को संग्रहित करती हैं। इसके बाद सावित्री देवी की पूजा और व्रत कथा का पाठ करती हैं। महिलाएं पीपल वृक्ष के नीचे बैठकर पूजा करती हैं और अर्घ्य देती हैं। यह व्रत सावित्री देवी की कथा, व्रत कथा पुस्तक, फल, फूल, दिव्य जल, चावल, सिन्दूर, मीठाई आदि को संग्रहित करती हैं। इसके बाद सावित्री देवी की पूजा और व्रत कथा का पाठ करती हैं।





व्रत के दिन महिलाएं सुबह जल्दी उठकर स्नान करती हैं और व्रत की संबंधित सामग्री जैसे कि सावित्री व्रत की कथा, व्रत कथा पुस्तक, फल, फूल, दिव्य जल, चावल, सिन्दूर, मीठाई आदि को संग्रहित करती हैं। इसके बाद सावित्री देवी की पूजा और व्रत कथा का पाठ करती हैं।

इस व्रत के दौरान महिलाएं पति के लंबी उम्र और सुख-शांति की कामना करती हैं। व्रत के बाद महिलाएं भगवान विष्णु की आराधना करती हैं और व्रत कथा को पढ़कर इसे समाप्त करती हैं। यह व्रत सावित्री देवी की महिलाओं द्वारा भक्ति और पतिव्रता के प्रतीक के रूप में मान्यता प्राप्त है और यह पुरानी परंपराओं और मान्यताओं के अनुसार मनाया जाता है।

वट पूर्णिमा व्रत क्या है (Vat purnima vrat) 

वट पूर्णिमा व्रत हिंदू धर्म में माघ मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को मनाया जाने वाला एक प्रमुख व्रत है। यह व्रत वट वृक्ष (बरगद के पेड़) की पूजा और आराधना पर आधारित है। इस व्रत को मनाने से मान्यता है कि इससे मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और वृक्षों का आशीर्वाद प्राप्त होता है।





वट पूर्णिमा के दिन मनुष्यों को वट वृक्ष की पूजा करनी चाहिए। लोग उठकर स्नान करने के बाद वट वृक्ष के पास जाते हैं और उसे पूजा करते हैं। वृक्ष की ध्यान देते हुए प्रार्थना करते हैं और उसे दिव्य जल, फूल, दूध, दीपक, नैवेद्य, अक्षत, धूप, चंदन आदि से सजाते हैं।

इसके अलावा, वट पूर्णिमा के दिन कई लोग अन्नदान, व्रत कथा के पाठ, धार्मिक कार्यों, सत्संग, संत समागम आदि करते हैं। यह व्रत धार्मिक और सामाजिक महत्व रखता है और लोग वृक्षों की संरक्षण, प्रदूषण नियंत्रण, पर्यावरण संरक्षण के प्रतीक रूप में भी इसे मान्यता प्रदान करते हैं। वट पूर्णिमा व्रत धार्मिक और सामाजिक एकता को संकल्पित करता है और वृक्षों के महत्व को प्रमोट करता है। इस व्रत के माध्यम से लोग प्रकृति के साथ संवाद स्थापित करते हैं और पर्यावरण संरक्षण के महत्व को समझने का संकेत देते हैं।

वट सावित्री व्रत व वट पूर्णिमा व्रत 2023 कब है (Vat savitri or Vat Purnima 2023 Date)

  • वट सावित्री पूर्णिमा पूजा 2023 तारीख , शुभ मुहूर्त
  • पूर्णिमा तिथि प्रारंभ : जून 3 , 2023 को 11. 16 AM बजे
  • पूर्णिमा तिथि समाप्त : जून 4, 2023 को 0 9 : 11 AM बजे

वट सावित्री क्यों मनाई जाती है (Reason of Vat savitri or Vat purnima)

वट सावित्री व्रत मान्यता के अनुसार मनाया जाता है ताकि महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र और सुख-शांति की कामना कर सकें। इस व्रत की कथा में महिला पत्नी सावित्री की कठोर तपस्या और पतिव्रता का प्रतीक है, जिसे धार्मिक एवं सामाजिक महत्व प्राप्त है।

कथा के अनुसार, सावित्री देवी के पति सत्यवान राजा की मृत्यु हो गई थी, लेकिन सावित्री ने उनकी आत्मा को फेरबदल करने के लिए यमराज से व्रत के माध्यम से भी मांग की थी। यमराज ने पहले मना कर दिया, लेकिन सावित्री ने अटकले नहीं पकड़ी और बार बार यही मांग की। अंततः, यमराज उन्हें वरदान दिया कि उनके पति को जीवित कर देगा। इस प्रकार, सावित्री ने अपने पति की लंबी उम्र प्राप्त की और पतिव्रता की महिमा को प्रशंसा की गई।

इसलिए, वट सावित्री व्रत महिलाएं सावित्री देवी की पूजा और आराधना करती हैं और उनके पति की लंबी उम्र और सुख-शांति की कामना करती हैं। यह व्रत पतिव्रता, प्रेम और पति-पत्नी के संबंधों का महत्व बताता है और महिलाओं को सामाजिक और आध्यात्मिक संकल्प को समर्पित होने का अवसर देता है।

वट सावित्री व वट पूर्णिमा व्रत महत्त्व (Vat savitri or Vat purnima Mahatv)

वत पूर्णिमा वट सावित्री व्रत 2023 का महत्त्व- वट सावित्री और वट पूर्णिमा व्रत दोनों ही हिंदू धर्म में महत्वपूर्ण व्रत हैं। यह व्रत महिलाओं के लिए विशेष महत्त्व रखता है और इन व्रतों को मनाने से उन्हें सौभाग्य, सुख, समृद्धि और पतिव्रता की शक्ति प्राप्त होती है।

वट सावित्री व्रत के माध्यम से महिलाएं सावित्री देवी की पूजा और आराधना करती हैं। इस व्रत का महत्त्व पतिव्रता, प्रेम और पति-पत्नी के संबंधों को प्रमोट करने में है। महिलाएं इस व्रत के माध्यम से अपने पति की लंबी उम्र और सुख-शांति की कामना करती हैं। इसके अलावा, इस व्रत को मनाने से महिलाओं को आत्म-विश्वास, सामर्थ्य और परिवार के सुख का आनंद मिलता है।

वत पूर्णिमा वट सावित्री व्रत 2023 का महत्त्व- वट पूर्णिमा व्रत माघ मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को मनाया जाता है। इस व्रत में वट वृक्ष (बरगद के पेड़) की पूजा की जाती है। इसका महत्त्व पूर्णिमा तिथि के साथ वट वृक्ष के महत्व को प्रमोट करने में है। लोग वट वृक्ष के पास जाते हैं, उसे पूजा करते हैं और उसकी आराधना करते हैं। इससे मान्यता है कि इससे मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और वृक्षों का आशीर्वाद प्राप्त होता है। इस व्रत के माध्यम से लोग प्रकृति के संग संवाद स्थापित करते हैं और पर्यावरण संरक्षण के महत्व को समझते हैं।

इन व्रतों को मनाने से विवाहित महिलाएं अपने पतियों की लंबी उम्र, सुख, समृद्धि और परिवार के सुख की कामना करती हैं। ये व्रत पतिव्रता, प्रेम और पति-पत्नी के संबंधों को समर्पित होने का अवसर प्रदान करते हैं और सामाजिक एवं आध्यात्मिक महत्वपूर्ण हैं।

वट सावित्री व वट पूर्णिमा व्रत से जुड़ी कथा (Vat savitri or Vat purnima vrat katha / story in hindi)

कथा 1: सावित्री की कथा
एक समय की बात है, एक राजकुमारी नाम सावित्री ने एक महान त्याग की कथा कही। वह एक पतिव्रता और विवेकी महिला थी जिसने पति सत्यवान के साथ सदा वफादारी रखी। एक दिन सत्यवान राजा के साथ वन में घूम रहे थे और उन्हें मृत्यु के आग्रह ने पकड़ लिया। यमराज आये और सत्यवान की आत्मा ले गए। सावित्री ने यमराज के पीछे चल कर उनकी आत्मा को संजीवनी देने की मांग की। धार्मिक एवं निर्भीक मन से यमराज ने उनकी मांग स्वीकार की और सावित्री को उनके पति को वापस देने की अनुमति दी। इस प्रकार, सावित्री ने अपने पति की जीवनदानी शक्ति से उसे जीवित कराया। यह कथा सावित्री की पतिव्रता और प्रेम की महिमा को प्रतिष्ठित करती है।

कथा 2: वट सावित्री की कथा
एक बार एक सती स्त्री नाम सावित्री ने एक व्रत रखा था जिसमें वह वट वृक्ष की पूजा कर रही थी। उस वक्त उसे देखा गया कि उसके पति की आत्मा यमराज के साथ ले जाई जा रही है। सावित्री ने यमराज के पीछे चलकर उन्हें रोका और अपनी पति की जीवनदानी लौटने की विनती की। यमराज ने कहा कि उसे उन्हें लौटाने का अधिकार नहीं है, लेकिन सावित्री अटकले नहीं पकड़ी और मृत्यु देवता के द्वारा अनेक वरदानों की मांग की। अंततः, यमराज ने सावित्री की प्रेम और पतिव्रता को देखकर उसे अपने पति की आत्मा को वापस देने की अनुमति दी। इस प्रकार, सावित्री ने अपनी पतिव्रता और प्रेम की शक्ति से अपने पति को जीवित कराया। यह कथा वट सावित्री व्रत की महिमा को प्रमोट करती है और महिलाओं के पति की लंबी उम्र और सुख-शांति की कामना करती है।





ये कथाएं सावित्री और वट सावित्री व्रत के महत्त्व को दर्शाती हैं और पतिव्रता, प्रेम और पति-पत्नी के संबंधों का महत्व बताती हैं। यह व्रत महिलाओं को सौभाग्य, सुख, समृद्धि और परिवार के सुख की कामना करने का अवसर प्रदान करता है।

वट सावित्री व वट पूर्णिमा व्रत पूजा विधि (Vat savitri or Vat purnima puja vidhi)

व्रत के दिन स्नान करें और शुद्ध होकर व्रत की शुरुआत करें। एक शुभ स्थान का चयन करें, जहां आप पूजा करना चाहते हैं। उस स्थान को साफ करें और एक चौकी या आसन स्थापित करें।

  • वट वृक्ष को सजाएँ और उसे चावल, रोली, फूल, दीपक आदि से सजाएँ।
  • वृक्ष के चारों ओर कलश रखें और उसमें जल, फूल, अर्क और दिया डालें।
  • सावित्री देवी की मूर्ति, तस्वीर या प्रतिमा के सामने बैठें और उनकी पूजा करें।
  • मंत्रों के साथ व्रत कथा पढ़ें और सावित्री देवी को अर्पण करें।
  • दूध, मिष्ठान और फल सावित्री देवी को अर्पण करें।
  • दीपक जलाएँ और आरती करें।
  • व्रत के दौरान सावित्री व्रत की कथा को सुनें या पढ़ें। इसके माध्यम से महिलाएं सावित्री देवी की  कथा और महिमा को याद करती हैं।
  • व्रत के दिन उपवास करें और दिनभर नियमित ध्यान, जप या मन्त्र जाप करें।
  • पूजा के बाद गरीबों को भोजन या दान करें। इससे आप दया और दान की परंपरा को बढ़ावा देंगे।

Q:- पूर्णिमा के कितने व्रत करना चाहिए?

पूरे वर्ष में 12 पूर्णिमा व्रत आते है। एक माह में एक बार पूर्णिमा और एक बार अमावस्या आती है। यह दोनों तिथि 15 दिन के अंतराल के बीच आती है। 




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