Nagarjunakonda Kya Hai (इतिहास)

Nagarjunakond About 

Nagarjunakonda Kya Hai (इतिहास):  अब तक हमने जाना कि कैसे मोहनजोदड़ो से भारत की शुरुआत हुई और कैसे भाई लोग वहां से आगे बढ़ते हुए गंगा नदी के किनारे जाकर बसते गए और पैर मौर्य अंपायर की शुरुआत होती है इसके बाद राइटर और आगे बढ़ते हैं और एक घटना बताते हैं 1920 में हुई थी बहुत ही फेमस घटना है जो 12 फरवरी 1920 को आंध्र प्रदेश के एक छोटे से गांव में टीचर वेंकटरमैया के साथ घटी उस दिन गांव का एक आदमी जंगल से भागते हुए आया और उसने बताया कि वहां जंगल में पत्थर की कुछ पिलर और मूर्तियां निकल रही है यह टीचर वहां पहुंचे और उन्होंने लोगों को समझाया कि वह पुराने जमाने की चीजें हैं इसे ही इतिहासकारों के आने तक ना छेड़ा जाए हम जानते हैं कि उस समय भारत में अंग्रेजों का शासन चल रहा था अंग्रेजों की तरफ से कुछ फेमस इतिहासकार वहां पर पहुंचे और उन लोगों ने उस जगह के बारे में जानकारी इकट्ठा की

Satvahan Kaun The – सातवाहन राजवंश : इतिहास, उत्पत्ति, साम्राज्य और गिरावट

जानकारी इकट्ठा करने के दौरान पता चला कि आगे एक जंगल है जो बहुत ही घना है और वहां जाने से लोगों को मलेरिया हो जाता है जिस वजह से लोग उस जंगल में नहीं जाते हैं

Nagarjunakonda इतिहास की दिलचस्प कहानी (Nagarjunakonda Story of History )

इतिहासकार रिसर्च के लिए उस जंगल में भी गए और वहां पाया कि वहां पर कुछ आदिवासी रहते हैं वह आदिवासी बहुत ही स्ट्रांग थे वह लोग जहरीले तीरों का का इस्तेमाल करते थे
इतने जहरीले होते थे कि अगर किसी बाग या जीता को लग जाए तो वह कुछ देर में ही वही मर जाता था आदिवासी उस समय भी शिकार करके ही खाते थे और अपनी कबीले के लीडर से पूछ कर के ही कोई काम करते थे

Nagarjunakonda Kya Hai (इतिहास)

जूस पिला और मूर्ति को देख कर गांव में हल्ला मचा हुआ था वह उन आदिवासियों के इलाके में और ज्यादा था जैसे तैसे वहां तक पहुंचा गया फिर उन सब के ऊपर रिसर्च की गई रिसर्च के दौरान पता चला और मूर्ति आज से हजारों साल पहले 220bce के आसपास इक्ष्वाकु वंश के राजाओं के द्वारा बनाए गए हैं

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Chandragupta Maurya Raja Kaise Bane

अगर इस वंश का नाम सुनते ही सबसे पहले श्री राम का नाम आपके मन में आता है तो आप बिल्कुल सही सोच रहे हैं हिंदू ग्रंथ में राम को इक्ष्वाकु वंश का राजा बताया गया है हालांकि लेखक किसी भी तरह का धार्मिक उपदेश नहीं जोड़ते हैं और उस पत्थर पर आगे चर्चा करते हुए बताते हैं कि पत्थर के पिलर और मूर्ति जिस जगह से निकले थे उसे नागार्जुनकोंडा बोला जाता है राइटर यह भी बताते हैं कि इस जगह पर सबसे पहले जमीन में से मूर्ति और पिलर निकलने को लेकर बहुत हो हल्ला हुआ





 

जिसके बाद 1920 में सबसे पहले यहां पर कोई इतिहासकार आया और 1931 तक लगभग 154 अलग-अलग जगह पर खुदाई करने के बाद खंडहर हो चुके मठ मंदिर स्तूप शिलालेख के मिट्टी के बर्तन और मूर्तियों के साथ-साथ और भी बहुत कुछ मिला इसके साथ ही पता चला कि इसमें से कुछ शतवाहन एंबार का भी है मतलब इंडिया के साउथ में आज से 5000 साल पहले लोगों का बदला शतवाहन एमपार के अंडर में शुरू हुआ था इस शहर में आने पर पता चलता है कि इस पर सबसे पहले शुभा को वंश के राजाओं का अधिकार था
और उन लोगों ने अपने शहर में दो बड़े-बड़े बाथरूम tank बनवाए थे  क्यों बनवाया गया था यह तो नहीं पता लेकिन तुम बहुत बड़े टाइम जिसमें अंडरग्राउंड ड्रेनेज सिस्टम रखा गया था इसके अलावा लाइमस्टोन के बहुत बड़े-बड़े पिलर पर अलग-अलग लोगों की मूर्ति बनी हुई थी और उनके कारनामों के बारे में भी लिखा गया था जिसमें सबसे पहले इतिहासकारों को महान सेनापति क्षमतापुल के बारे में पता चला

रहस्य ( Nagarjunakonda’s Secret )

आमतौर पर जब इतिहासकारों को ऐसी चीजें मिलती है तो उस पर राजाओं और राजा के घर से संबंधित लोगों के बारे में लिखा रहता है मगर यहां सेनापति और सैनिकों की बहुत तारीफ लिखी हुई थी इसके बाद राजा की माता के बारे में लिखा हुआ था और इस विजयपुर शहर से 30 से ज्यादा बुद्धिस्ट इस्टैब्लिशमेंट प्लस के बारे में भी पता चला जिसमें इतिहासकारों को यह एहसास हुआ कि अशोक के द्वारा साउथ में इक्ष्वाकु वंश और सातवाहन वंश तक बौद्ध धर्म को फैलाया गया यहां पर जिस तरह का आर्किटेक्चर इस्तेमाल किया गया वैसा ही गांधार में मतलब पाकिस्तान और अफगानिस्तान की कुछ जगहों पर भी मिला है मगर विजयापुरी का आर्किटेक्चर दादा पुराना है इस वजह से यह समझ में आता है कि यहां के लोगों ने अपने आर्किटेक्चर स्टाइल को पूरे वर्ल्ड में फैलाने की कोशिश की है जिस की कॉपी अफगानिस्तान तुर्की पाकिस्तान जैसी जगहों पर की गई थी इस जगह से और भी अलग-अलग तरह की चीजें मिली है जिसे देखकर इतिहासकार काफी चौक गए इन मूर्तियों और लाइमस्टोन पर लिखी गई जानकारी के आधार पर विजयापुरी में इक्ष्वाकु वंश और सातवाहन वंश जब राज्य करते थे उनके पास धन दौलत की कोई कमी नहीं थी साथ ही वह बहुत ही पावरफुल हुआ करते थे

इक्ष्वाकु वंश की औरतें भी काम किया करती थी और अच्छा पैसा कमाती थी कुछ औरतें मंत्री की पोजीशन पर दी थी जिससे राज्य में फैसला लेने में औरतों का भी बहुत बड़ा योगदान होता था अब तक भारत में जितना भी इतिहास मिला है उसमें मौर्य समाज पहला था जहां औरत के ऊपर किसी भी तरह का चूर्ण नहीं होता था उसके बाद इक्ष्वाकु वंशऔर सातवाहन वंश ऐसे समाज निकले जहां औरतों पर जुर्म नहीं होता था और वह कमाने और फैसले लेने में भी योगदान रखती थी
विजय पुरी की बहुत ज्यादा जानकारी पत्थर पर की गई कारीगरी से सामने आती है इससे इतिहासकारों को पता चला कि यहां पर रहने वाले लोग पत्थर पर कारीगरी करने के बहुत शौकीन थे और इस काम को काफी पसंद भी करते थे बड़े-बड़े महलों में यह दिखाया गया है कि कैसे बौद्ध धर्म के अलग-अलग मांग ध्यान कर रहे हैं इसके अलावा राजकुमार सिद्धार्थ घोड़े पर बैठकर आ रहे हैं इसकी कारीगरी भी की गई है राजा इक्ष्वाकु वंश के तीसरे राजा के मां महादेवी भक्ति देवी को बहुत बड़े और अच्छे तरीके से बनाया गया है इसके अलावा वहां पर पत्थर पर अलग-अलग कलाकृति में आप देखेंगे कि राजा बहुत सारी रानियों के साथ एक बड़े से पानी की टंकी में नहा रहे हैं और बच्चों के खेलते हुए डांसर का डांस करते हुए राजा का तलवारबाजी करते हुए चित्र भी दिखाया गया है वहां के मंदिर में भी एक अलग बात है जहां गंगा के किनारे बसे हुए जगह त्रिकोण छत का मंदिर बनाया जाता था
वही साउथ की अमरावती और विजयापुरी में लंबी छत वाले मंदिर बनाए जाते हैं इस जगह पर कुबेर शिव देवसेना और विष्णु की पूजा होती है सबसे पहले इन सभी जगहों पर शतवाहन वंश का राज्य था मगर धीरे-धीरे बुद्ध धर्म के लोगों की संख्या बढ़ने लगी और धर्म की लड़ाई चलने लगी जिस पर सातवाहन वंश के तीसरे राजा क्षमता मुलाने खुद को सातवाहनवाहन की राजधानी अमरावती से अलग कर लिया

और ऐसा माना जाता है कि उन्होंने पूछा पूरी राजधानी को बनाया और नया पंच स्थापित किया जिसे इक्ष्वाकु वंश कहां गया इस वंश का नाम इक्ष्वाकु इसलिए चुना गया क्योंकि यह अयोध्या के सूर्यवंशी 1 से ताल्लुक रखता है और राम से जुड़ा हुआ है जो समाज में राजा को अलग वैल्यू देगा इस वजह से उन्होंने अपने वंश का नाम शतवाहन से बदलकर इक्ष्वाकु कर दिया वह भगवान कार्तिकेय के बाद तो हुआ करते थे उन्होंने भक्ति और राज्य दोनों को एक साथ आगे बढ़ाने के लिए एक प्रथा शुरू की जिस प्रथा में वह घोड़े की पूजा करके उसे छोड़ देते थे वह घोड़ा जहां जहां पैर रखता था वह सब जगह इक्ष्वाकु वंश के राजा के अधीन हो जाती थी
जो इस घोड़े को रोकता था उसे राजा से जंग करनी पड़ती थी इस प्रथा को अश्वमेध यज्ञ का नाम दिया गया जिससे आगे चलकर इक्ष्वाकु वंश के साम्राज्य को बहुत दूर तक फैलाया आगे बताते हैं कि इस इक्ष्वाकु को वंश कैसे खत्म हुआ
इसके बारे में किसी को कोई ठोस जानकारी नहीं है बहुत सारे इतिहासकारों को एक बहुत बड़ी मिस्ट्री लगती है इसे लेकर साल 1934 में एक रिपोर्ट सामने आई थी उसके बाद एक और रिपोर्ट 2006 में पब्लिश की गई दोनों रिपोर्ट में इक्ष्वाकु वंश के खत्म होने पर अलग-अलग theory पेश की गई है







पहली रिपोर्ट में बताया जाता है कि विजय पुरी के ऊपर पल्लव वंश के लोगों ने आक्रमण किया इस वजह से विजय पूरी खत्म हो गई विजय पुरी के डिस्ट्रक्शंस को देखकर ऐसा लगता है कि पल्लव वंश वहां पर खजाना ढूंढने के लिए नहीं आए थे वह लोग जानबूझकर इक्ष्वाकु वंश के द्वारा बनाई गई खूबसूरत मूर्तियों और स्तूपोर को तोड़ रहे थे इसके अलावा इक्ष्वाकु वंश का सर्व देव मंदिर जो उस समय का सबसे बड़ा मंदिर था उसको पल्लव वंश के लोगों के द्वारा जला दिया गया इस तरह के इतिहास को देखकर लगता है कि हो न हो इस वंश की कोई पॉलिटिकल दुश्मनी वंश के साथ चल रही थी जिसके बाद मौका देखकर अचानक आक्रमण किया गया और इस वंश को पूरी तरह से खत्म कर दिया गया इसके अलावा

दूसरी रिपोर्ट बताती है कि अचानक वहां बहुत ज्यादा सूखा पड़ गया और कोई भी ऐसा मजबूत राजा मौजूद नहीं था जो वहां के लोगों को एकजुट करके रख सके इस वजह से लोग वहां से पलायन करने लगे और धीरे-धीरे इक्ष्वाकु वंश खत्म हो गया उसके इतिहास में लिखने के लिए आगे कुछ भी नहीं बचा इस वजह से उन्होंने 320bce तक का ही इतिहास लिखा हालांकि अपनी किताब में इसके आगे के बारे में बताते हुए राइटर करते हैं कि इतिहासकारों का मानना है कि पल्लव वंश ने उस जगह पर राज नहीं किया वह केवल वहां तबाही मचा कर कुछ सालों में लौट गए उसके बाद राजा कृष्णदेव हार ने इस जगह पर काबू किया और विजय नगर के नाम से इसे स्थापित किया और यहां से इतिहास के सबसे बुद्धिमान इंसानों में से एक तेनालीराम की कहानी शुरू होती है

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