Wednesday, July 24, 2024
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जगद्धात्री पूजा कब मनाई जाती है कथा महत्व इतिहास 2023

जगद्धात्री पूजा कब मनाई जाती है – हेलो दोस्तों मेरा नाम मोहती है आज  में आपको जगद्धात्री पूजा के बारे में बताने जा रहा हूँ जगद्धात्री माता, माँ दुर्गा का ही एक स्वरूप हैं शरद ऋतू के प्रारंभ में इनकी पूजा का महत्व बताया जाता हैं. पुरे भारत देश में पश्चिम बंगाल दुर्गा मैया की पूजा के लिए प्रसिद्द हैं. भक्तजन पश्चिम बंगाल की पूजा देखने के लिए विशेषरूप से इन दिनों पश्चिम बंगाल जाते हैं. नव दुर्गा की पूजा के साथ, जगद्धात्री पूजा का भी विशेष स्थान हैं. यह उड़ीसा के कुछ स्थानों पर भी बड़े उत्साह से की जाती हैं. यह तंत्र से उत्पन्न हुई हैं यह माँ काली एवम दुर्गा के साथ ही सत्व के रूप में हैं. इन्हें राजस एवम तामस का प्रतीक माना जाता हैं.

कब मनाई जाती हैं जगद्धात्री पूजा

यह पर्व दुर्गा नवमी के एक माह के बाद मनाया जाता हैं. चन्दन नगर प्रान्त में इस पर्व का जन्म हुआ था. यह चार दिवसीय पर्व हैं जिसमे मेला सजता हैं एवम पुरे जोश के साथ भव्य रूप में इस त्यौहार को मनाया जाता हैं.  जगद्धात्री पूजा कार्तिक माह शुक्ल पक्ष की अष्टमी से शुरू होकर दशमी तक मनाया जाता हैं.



दुर्गा के इस रूप की पूजा गोस्थाष्ट्मी के दिन होती है| यह एक दुर्गा पूजा की तरह ही होती है, जो अष्टमी तिथि के दिन शुरू होकर, दशमी के दिन समाप्त होती है. ये 21 नवंबर को मनाई जाएगी. 24 नवंबर को अष्टमी का दिन है, जिसका विशेष महत्व होता है.

मुख्य त्यौहार 21 नवंबर

ये त्यौहार चन्दननगर, कृष्णानगर, नदिया एवं कलकत्ता में दुर्गा पूजा एवं काली पूजा के बाद कार्तिक माह में मनाया जाता है| कलकत्ता में हिन्दुओं का ये बहुत बड़ा त्यौहार होता है.

जगद्धात्री माता के रूप का वर्णन

जगद्धात्री माता का रंग सुबह के सूर्य की लालिमा के समान होता हैं इनकी तीन आँखे एवम चार हाथ हैं जिनमे शंख, धनुष,तीर, एवम  चक्र हैं. माता लाल रंग के वस्त्र धारण करती हैं, गहने धारण करती हैं नगजन्गोपवीता धारण करती हैं. माता सिंह पर सवारी करती हैं जो कि एक मृत दानव हाथी पर खड़ा हैं. इसके पीछे एक बात विख्यात हैं कि यह प्रतिमा यह कहती हैं माता उन्ही के ह्रदय में वास करती हैं जो अपने अंदर उन्मत हाथी के भाव को नियंत्रित कर सकते हैं, अर्थात जो अपने गलत एवम अहम् भाव को खत्म कर चुके हैं.

जगद्धात्री पूजा का इतिहास

जगद्धात्री पूजा कब मनाई जाती है – कहते है इस त्यौहार की शुरुवात रामकृष्ण की पत्नी शारदा देवी ने रामकृष्ण मिशन में की थी| वे भगवान् के पुनर्जन्म में बहुत विश्वास रखती थी. इसकी शुरुवात के बाद इस त्यौहार को दुनिया के हर कोने में मौजूद रामकृष्ण मिशन के सेंटर में मनाने लगे थे| इस त्यौहार को माँ दुर्गा के पुनर्जन्म की ख़ुशी में मनाते है. माना जाता है देवी, प्रथ्वी पर बुराई को नष्ट करने और अपने भक्तों को सुख शांति देने आई थी|

जगद्धात्री पूजा का चन्दन नगर इतिहास

चन्दन नगर उन स्थानों में से है,जहाँ कभी अंग्रेजी हुकूमत नहीं रही. इसी स्थान से जगद्धात्री पूजा का जन्म हुआ. चन्दन नगर में चन्दन का व्यापार सर्वाधिक होता हैं एवम इसमें बहती नदी का आकार आधे चाँद के समान हैं, शायद इसलिए इस जगह का नाम चन्दन नगर हैं. इस जगह पर फ्रांस के राजा का राज्य था उस समय एक बड़े व्यापारी हुआ करते थे, जिन्हें कई बड़े अधिकार प्राप्त थे. उनका नाम इंद्रनारायण चौधरी था. सन 1750 में इन्होने सबसे पहले अपने घर में जगद्धात्री पूजा की, जिसके बाद से यह पूजा बढ़ते- बढ़ते एक भव्य रूप ले लिया. अब यह पूजा पुरे चन्दन नगर के साथ पश्चिम बंगाल, कोलकाता, बिहार, उड़ीसा, कृष्णा नगर, हुगली जैसे स्थानों पर बहुत उत्साह से होती हैं.

जगद्धात्री पूजा का विवरण बकिम चंद चटोउपाध्याय ने अपने उपन्यास बंदेमातरम् में किया हैं. जगद्धात्री माता को भारत माता के रूप में देखा जाता हैं.

जगद्धात्री मैला उत्सव

जगद्धात्री पूजा कब मनाई जाती है – इस चार दिवसीय त्यौहार में कई जगहों पर जगद्धात्री मेले का आयोजन किया जाता हैं. इसमें कई झाँकियाँ निकाली जाती हैं, जिसमे पौराणिक कथा एवम चन्दन नगर के इतिहास को सभी के सामने दर्शाया जाता हैं. माता के भजन, गायन एवम गरबा रास का आयोजन किया जाता हैं.


उड़ीसा में जैसे जगन्नाथ जी की रथयात्रा बहुत प्रसिध्य है, वैसे ही जगद्धात्री का मेला बहुत फेमस है| ये मेला 8-15 दिन का होता है| सन 2012 में इस पूजा को मनाते हुए 60 साल हो गए थे, जिसके बाद डायमंड जुबली मनाते हुए, यह मेला पहली बार 13 दिनों तक चलता रहा| हर साल इस पूजा का मुख्य आकर्षण पंडाल और मेला होता है| हर साल पंडाल को नए तरीके से किसी नयी संरचना के रूप में बनाया जाता है| ताजमहल, विक्टोरिया मेमोरियल, टाइटैनिक शीप, लोटस मंदिर, स्वर्ण मंदिर आदि प्रसिद्ध संरचना का स्वरुप  यहाँ बनाया जा चूका है| सन 2009 में मुंबई की होटल ताज में हुए 26/11 धमाके को एक पंडाल का रूप दिया गया था|

यह भव्य आयोजन गोपाष्टमी के दिन किया जाता हैं. इसमें कई तरह के नाट्य नाटिका भी प्रस्तुत किये जाते हैं.

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जगद्धात्री पूजा पौराणिक महत्व एवं कथा

दुर्गा पूजा | प्यार की अकादमी

महिषासुर के आतंक के कारण देवताओं का जीवन दूभर हो जाता है, जिस कारण वे माँ दुर्गा की शरण में जाते हैं. लंबे युद्ध के बाद माता द्वारा महिषासुर का वध किया जाता हैं जिसके बाद देवताओं को स्वर्ग का आधिपत्य पुनः मिल जाता हैं जिससे देवताओं में घमंड के भाव आ जाते हैं और वे स्वयं को सर्वश्रेष्ठ समझने लगते हैं

जगद्धात्री पूजा कब मनाई जाती है – उनके इस घमंड को तोड़ने के लिए यक्ष देव को देवताओं के पहले पूज्य बनाया जाता हैं, जिससे देवताओं को अपमान महसूस होता हैं और एक एक करके वो यक्ष देव के पास जाते हैं. यक्ष देव वायु देव से एक सवाल करते हैं कि आप क्या कर सकते हैं. घमंड में चूर वायु देव कहते हैं वो कितने ही ऊँचे पहाड़ को पार कर सकते हैं, कितनी ही गति से ब्रह्मांड का चक्कर लगा सकते हैं.

तब यक्ष देव अति सूक्ष्म रूप धारण करके वायु देव से कहते हैं कि इसे नष्ट करके दिखाओ लेकिन वायु देव उसका कुछ नहीं बिगाड़ पाते इस प्रकार सभी देव विफल हो जाते हैं. तब उन्हें यह ज्ञान मिलता हैं उनके पास उनका कुछ नहीं हैं परम परमेश्वर के पराक्रम के बिना उनका अस्तित्व साधारण मनुष्य के समान भी नहीं. तब यह कहा जाता हैं कि जिस मनुष्य में अहम् का भाव नहीं होता उन्ही को माता जगद्धात्री की कृपा प्राप्त होती हैं .

जगद्धात्री पूजा विधि

माँ दुर्गा की पूजा के समान ही इस पूजा को किया जाता हैं. इसमें खासतौर पर मनुष्य को अपनी ज्ञानेन्द्रियों पर नियंत्रण रखने का ज्ञान मिलता हैं. अभिमान का नाश ही इस उत्सव का मकसद हैं.

इस त्यौहार में जगद्धात्री की बड़ी सी प्रतिमा को पंडाल में बैठाते है| यहाँ बिलकुल दुर्गा पूजा जैसा माहोल होता है| प्रतिमा को सुंदर लाल साड़ी, तरह – तरह के जेवर पहनाए जाते है. देवी की प्रतिमा को फूलों की माला से भी सजाया जाता है| देवी जगद्धात्री और देवी दुर्गा का स्वरुप बिलकुल एक जैसा होता है|

जगद्धात्री पूजा कब मनाई जाती है – नव रात्रि उत्सव के समान ही इसका आयोजन किया जाता हैं. लेकिन आज कल इस आयोजन के लिए लोग क्लब एवम पार्टी करने लगे हैं जिसमे बहुत पैसा ख़राब होता हैं और एक पवित्र पूजा ने पार्टी का रूप ले लिया हैं. आधुनिकता का प्रभाव त्यौहारों पर भी पड़ रहा हैं. भगवान की भक्ति में ही दिखावा हैं ऐसे में त्यौहार अपने मूल उद्देश्य से काफी दूर हो गए हैं.



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